उत्तर प्रदेश में 80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत

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  • जागृत हिन्दू जानते हैं कि हिन्दू होना ही हिंदुत्व है

राहुल गांधी के सपने में भगवान शिव आने लगे है और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के सपने में भगवान कृष्ण। यह है हिंदुत्व के नवजागरण का असर, ऐसे में योगी ने खुलेआम 80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत का चुनाव कह कह कर बड़ी लकीर खिंच दी है। जागृत हिन्दू जानते हैं कि हिन्दू होना ही हिंदुत्व है ।

  • अजय सेतिया, वरिष्ठ पत्रकार
    setiaajay@gmail.com

2014, 2016 और 2021 में भी आरएसएस ने 34 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले असम में हिंदुत्व की राजनीति का करिश्मा कर के दिखाया है। हिंदुत्वा की इसी राजनीति को आगे बढाते हुए आरएसएस ने 2017 में योगी आदित्य नाथ को यूपी का मुख्यमंत्री बनवाया था। आरएसएस हिंदुत्व वाला चेहरा चाहती थी, क्योंकि आरएसएस बेहतर जानता था कि अल्टीमेटीली 2014 से भाजपा की विजय मोदी के हिंदुत्वा के कारण शुरू हुई है और उससे भटकना गलत होगा।

मोदी विकास को मुद्दा बना कर आगे बढने का दावा कर रहे थे, इसलिए हिंदुत्व को किनारे रख कर राजनीति करना चाहते थे। गैर हिंदुत्वा की राजनीति कांग्रेस और बाकी दलों को भी मुफीद बैठती, लेकिन आरएसएस ने योगी आदित्य नाथ को मुख्यमंत्री बनवा कर देश की राजनीतिक दिशा ही बदल दी । योगी ने 20 फीसदी मुस्लिम आबादी वाले उतर प्रदेश में पांच साल तक शुद्ध हिंदूवादी राजनीति कर के 70 साल से चली आ रही मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति का राम नाम सत्य कर दिया । पिछले पांच सालों में कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दलों को यह एहसास हो गया है कि अब हिन्दुओं को दरकिनार कर के राज नहीं किया जा सकता।

वैसे तो भाजपा को शायद ही कहीं से मुस्लिम वोट मिलते हों, लेकिन यह पहली बार है, जब योगी आदित्य नाथ खुलेआम सिर्फ हिन्दुओं से वोट मांग रहे हैं। चुनावों का एलान होने के बाद उन्होंने साफ साफ कहा है कि यह चुनाव 80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत के बीच होगा। उत्तर प्रदेश में हिंदुओं की आबादी 79.73 प्रतिशत है जबकि मुस्लिम जनसंख्या 19.26 फीसदी है। योगी के इस बयान को विपक्ष अगर वोटों के धुव्रीकरण से जोड़कर देख रहा है, तो गलत नहीं देख रहा । योगी का आशय हिन्दू मुस्लिम से ही है ।

ऐसा नहीं है कि योगी के नेतृत्व में यूपी में विकास नहीं हुआ, विकास भी हुआ है, लेकिन यूपी में चुनावी राजनीति की हकीकत यह है कि हिंदुत्व की राजनीति से पहले जातीय राजनीति चल रही थी। अगर सपा, बसपा जातीय राजनीति के सहारे सत्ता तक पहुंची थी, तो 1980 तक कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति कर के सत्ता में रही थी। आरएसएस की सालों की मेहनत के बाद यूपी में जातीय राजनीति पर हिंदुत्वा की राजनीति हावी हुई है। आरएसएस भाजपा ने असम और यूपी में हिंदुत्वा की राजनीति का सफल प्रयोग किया है।

कांग्रेस ने हिंदुत्वा के इस उभार को 2008-09 में अनुभव करना शुरू कर दिया था, इसलिए तभी से आरएसएस को आतंकवादी संगठन कह कर हिन्दुओं से अलग करने की साजिश शुरू हुई। दो घटनाओं को याद करिए, भगवा आतंकवाद का जुमला और राहुल गांधी का यह कहना कि मुस्लिम आतंकवाद से ज्यादा खतरनाक हिन्दू आतंकवाद है । गांधी की हत्या के बाद से कांग्रेस यही रणनीति अपनाती रही थी, जो 40-50 साल तक सफलतापूर्वक चलती रही थी ।

भाजपा की हिंदुत्वा राजनीति का मुकाबला करने के लिए कांग्रेस अब हिन्दू और हिंदुत्वा को अलग करने की थ्योरी पर राजनीति का प्रयोग शुरू कर रही है । जिसमें हिन्दू को साफ्ट हिन्दू बताया जा रहा है , जो सभी धर्मों का सम्मान करता है और हिंदुत्वा को अग्रेसिव हिन्दू बताया जा रहा है, जिस ने गांधी की हत्या की थी । यानी है वही, हिन्दुओं में फूट डाल कर राज हासिल करने की पुरानी राजनीति। फर्क सिर्फ यह है कि अब कांग्रेस का मौजूदा नेतृत्व हिन्दुओं की ताकत को महसूस करता है और उन की सत्ता को भी कबूल करता है।

याद करिए पांच दिसंबर 2021 को राहुल गांधी ने राजस्थान की एक रैली में क्या कहा था। उन्होंने कहा था कि ‘2014 से, हिंदुत्ववादी सत्ता में हैं, न कि हिंदू। हमें उन्हें बाहर करने और हिंदुओं का शासन लाने की जरूरत है। यानी राहुल गांधी हिन्दुत्ववादियों को सत्ता से हटा कर हिन्दुओं को सत्ता में लाने की बात कर रहे हैं। इसी रैली में बड़े हास्यस्पद ढंग से उन्होंने आंदोलनकारी किसानों को हिन्दू और नरेंद्र मोदी को हिन्दुत्ववादी कहा । उन्होंने कहा था -‘जब हिन्दू किसान खड़े हुए , तो हिन्दुत्ववादी ने कहा, मैं माफी माँगता हूँ।

बावजूद इस के कि उन के खुद के हिन्दू होने का कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि वह जन्म से पारसी हैं, उन के पिता राजीव गांधी के पिता फिरोज गेंडी पारसी थे। राजीव गांधी या राहुल गांधी के सनातन हिन्दू धर्म अपनाने के कोई प्रमाण मौजूद नहीं हैं। लेकिन राजस्थान की इसी रैली में उन्होंने खुद को फिर से हिन्दू कहा । अगर हिन्दू कहना मजबूरी न होती, तो वह खुद को बार बार हिन्दू घोषित नहीं करते।

याद करिए यूपीए के शासनकाल में कांग्रेस की रणनीति किस तरह की हुआ करती थी। 9 दिसंबर 2006 को राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक में मनमोहन सिंह ने कहा था कि देश के संसाधनों पर पहला हक अल्पसंख्यक मुसलमानों का है। सिर्फ मनमोहन सिंह ही क्यों, कांग्रेस के सभी प्रधानमंत्री देश के ससाधनों पर मुस्लिमों का पहला हक मान कर उन्हीं के लिए काम कर रहे थे। हालांकि पंडित जवाहरलाल नेहरू खुद को धर्मनिरपेक्षता के प्रति समर्पित कहते थे, लेकिन प्रधानमंत्री के रूप में उन्होंने मुसलमानों को सामने रख कर ही राजनीति की।

मुसलमान नाराज नहीं होने चाहिए, हिन्दू भले ही नाराज हो जाएं। सोमनाथ मंदिर का उद्घाटन करने के लिए राष्ट्रपति राजेन्द्र प्रसाद को रोकने की कोशिश उन की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति का प्रत्यक्ष उदाहरण है । बाद में इंदिरा गांधी ने भी खुद की मुसलमानों के रक्षक की छवि बनाई। शाहबानों के मामले में तलाकशुदा महिलाओं से गुजारा भत्ते का हक छीन कर राजीव गांधी ने भी मुस्लिम समर्थक छवि को मजबूत किया। और यूपीए शासन तक खुद राहुल गांधी किस तरह हिन्दू आतंकवाद की थ्योरी दे रहे थे। अभी तीन साल पहले 2018 में उन्होंने मुसलमानों की एक बंद कमरे में हुई मीटिंग में कहा था – ‘हां, कांग्रेस एक मुस्लिम पार्टी है।

अब वही राहुल गांधी कभी खुद को हिन्दू साबित करने के लिए उसी सोमनाथ मन्दिर की यात्रा करते हैं, जिस का उद्घाटन करने के लिए उन के नाना ने राष्ट्रपति को रोका था। कभी जनेऊ पहनते हैं, कभी अपने नाना का गौत्र अपना गौत्र बताते है। कभी वाराणसी में दुर्गा स्तुति गाते हैं, कभी खुद को शिव भक्त बताने के लिए कैलाश यात्रा करते हैं। और अब तो सार्वजनिक मंच से हिन्दुओं का शासन लाने की बात करने लगे हैं।

असम और यूपी से उन्हें समझ आ गया है कि मुस्लिम राजनीति के बूते कांग्रेस कभी सत्ता में नहीं आ सकेगी। राहुल गांधी के सपने में भगवान शिव आने लगे है और सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के सपने में भगवान कृष्ण। यह है हिंदुत्व के नवजागरण का असर , ऐसे में योगी ने खुलेआम 80 प्रतिशत बनाम 20 प्रतिशत का चुनाव कह कह कर बड़ी लकीर खिंच दी है। जागृत हिन्दू जानते हैं कि हिन्दू होना ही हिंदुत्व है ।

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