भारत भक्ति सेवा पथ पर अभाविप के 73 साल

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  • विद्यार्थी परिषद का कार्य देश के दूरदराज स्थानों पर भी फैल रहा है

विद्यार्थी परिषद का कार्य आज देश के दूरदराज स्थानों पर भी फेल रहा है। विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता भारत माता की जय वंदे मातरम के नारे लगाते हैं, लेकिन उनके लिए वह केवल नारा नहीं, वह जीवननिष्ठा है। यही कारण है कि जहां परिषद पहुंचता है, वहां राष्ट्रीयता हावी होती है और अराष्ट्रीय व देशविरोधी ताकतें समाप्त होना प्रारंभ हो जाती है।

  • संदीप वैष्णव

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (अभाविप) का कार्य देश के दूरदराज स्थानों पर भी फैल रहा है। विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ता भारत माता की जय, वंदे मातरम के नारे लगाते हैं, लेकिन उनके लिए वह केवल नारा नहीं, वह जीवननिष्ठा है। यही कारण है कि जहां परिषद पहुंचती है, वहां राष्ट्रीयता का वर्चस्व होता है और अराष्ट्रीय व देशविरोधी ताकतों का संघर्ष प्रारंभ हो जाता है। अभाविप ने ‘सेवा के लिए छात्र, विकास के लिए छात्र’ कलामंच, मेडिविजन, एग्रीविजन जैसे कई प्रकल्पों के माध्यम से छात्रों को जोड़ा है। संख्या बढ़ती है तो गुणवत्ता घटती है, लेकिन अभाविप ने 73 साल में यह साबित किया है कि हमारी संख्या बढ़ रही है, संख्या बढऩे के साथ-साथ हमारी गुणवत्ता भी बढ़ रही है । 73 वर्षों से लगातार कई युवा पीढिय़ों को समाज और देश के प्रति जाग्रत करने वाला छात्र के हित में, छात्रों के द्वारा, छात्रों के लिए 9 जुलाई 1949 को बना विश्व का सबसे बड़ा छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ज्ञान-शील-एकता के मूल मंत्र के साथ आजादी के बाद देश के हित में सोचकर आगे बढऩे का सपना था।

देश जब 1947 में आजाद हुआ तब किसी ने कहा कि छात्र अराजकता फैलाता है, किसी ने कहा कि विद्यार्थी राजनेताओं के पीछे जिंदाबाद मुर्दाबाद करने वाली फौज है। उस समय कई राजनीतिक दलों ने अपने छात्र संगठन भी खड़े किए। जब वामपंथी हिंसक आंदोलन का भ्रम भी छात्रों को प्रभावित कर रहा था उसी समय विद्यार्थी परिषद ने समस्त छात्र समुदाय को राष्ट्रनिर्माण के उद्देश्य को लेकर सामूहिकता के भाव के साथ संगठित किया। परिषद ने कहा कि छात्र शक्ति उपद्रवी तत्व नहीं है, यह एक राष्ट्रशक्ति है। विद्यार्थी परिषद ने राष्ट्रीय पुनर्निर्माण की प्रक्रिया को गति देने वाली सुसंस्कारित छात्र शक्ति का निर्माण करने का लक्ष्य लिया। परिषद के स्थापना काल के समय मांगपत्र में तीन प्रमुख मांग थी, जिसमें देश का नाम भारत हो, वंदे मातरम् को राष्ट्रीय गीत माना जाए, राष्ट्रभाषा हिंदी हो।

आजादी के बाद लगातार : वामपंथी एवं कम्युनिस्ट संगठन द्वारा तानाशाही एवं हिंसक क्रूर आंदोलन को बढ़ावा दिया जा रहा था। वही विद्यार्थी परिषद द्वारा लोकतंत्र में विश्वास रखते हुए रचनात्मक आंदोलन, कार्यक्रम के लिए युवाओं को प्रेरित किया। जैसे-जैसे विद्यार्थी परिषद का कार्य कैंपस में बढ़ता गया वैसे-वैसे कैंपस से नक्सली एवं वामपंथी विचारधारा के लोग बाहर होते नजर आ रहे थे। विद्यार्थी परिषद् द्वारा शिक्षा के मंदिरों में राष्ट्रवाद की अलख जगाना प्रारंभ की तो धीरे-धीरे देश विरोधी संगठन परिसरों से बाहर होते नजर आए। महाविद्यालय एवं छात्रावासों में परिषद की सक्रियता से काफी हद तक रैगिंग, गुंडागर्दी का प्रभाव कम हुआ। छात्र आंदोलन जगह-जगह पर हो रहे थे।

शिक्षा परिसरों में बढ़ती अव्यवस्था के खिलाफ संपूर्ण समाज जन में असंतोष था। अभाविप लगातार रचनात्मक आंदोलनों के साथ छात्र हित के लिए सतत प्रयासरत था। उस समय विद्यार्थी परिषद के विस्तार के साथ कई छात्रों से जुड़े मुद्दे के साथ-साथ राष्ट्रीय मुद्दे भी सामने नजर आ रहे थे। परिषद ने 1971 के अधिवेशन में अपनी भूमिका को स्पष्ट किया कि छात्र कल का नहीं, अपितु आज का नागरिक है। छात्र शक्ति-राष्ट्रशक्ति है। उस समय राजनीतिक, शैक्षणिक और आर्थिक क्षेत्रों में उस प्रकार की प्रगति नहीं हुई थी जिस प्रकार की अपेक्षा की गई थी।

भारत में कई प्रकार के असंतोष व्याप्त थे जिससे विद्यार्थी वर्ग भी काफी परेशान था। उस समय की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा छात्रों के आंदोलन को दबाने का प्रयास किया जा रहा था। 1973 में गुजरात में मेस भोजन को लेकर, बढ़ती महंगाई को लेकर भी लगातार छात्रों ने आंदोलन किए। परिषद के कार्यकर्ताओं ने बिहार में भी आंदोलन प्रारंभ किया। परिवर्तन की चाह को लेकर व्यापक आंदोलन किया गया। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा उस आंदोलन को कुचलने का प्रयास किया गया, लेकिन वह आंदोलन देशव्यापी हो गया। नवनिर्माण आंदोलन जयप्रकाश नारायणजी के नेतृत्व में किया गया। लोकतंत्र पर खतरा मंडरा रहा था। तब विद्यार्थी परिषद ने लगातार प्रदर्शन, विधानसभा घेराव आदि का आह्वान किया। 26 जून 1974 को इंदिरा सरकार द्वारा अकस्मात आपातकाल की घोषणा कर दी गई। और कई बड़े नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया। 4 जुलाई को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ सहित 27 संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। उसके बाद विद्यार्थी परिषद ने आपातकाल विरोधी सत्याग्रह खड़ा करने का निर्णय लिया।

पूरे देश में आपातकाल हटाओ की मांग उठने लगी। जगह-जगह पर विद्यार्थी परिषद ने टोली बनाकर आपातकाल के खिलाफ आंदोलन प्रारंभ किया। इस काल में परिषद के लगभग 4500 कार्यकर्ता कारावास में डाले गए। लगातार चल रहे आंदोलन के बाद आखिरकार आपातकाल हटाना पड़ा। लोकतांत्रिक रूप से चुनाव हुआ। जनता पार्टी के गठबंधन की सरकार बनी। जब सभी छात्र संगठन पार्टियों में विलीन हो गए तब परिषद ने विचार किया कि उसे मूल संकल्पना ‘राज नहीं, समाज बदलना हैÓ इस भूमिका को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। ‘राजनीतिक सत्ता परिवर्तन हुआ लेकिन समाज परिवर्तन का काम विराट हैÓ और हमने पार्टियों में विलीन होने से साफ मना कर दिया। दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कार्य किया।

परिषद ने उसके बाद भी लगातार छात्रों से जुड़े मुद्दे परीक्षा शुल्क व्यवस्था, पाठ्यक्रम, छात्रावास छात्राओं के लिए अलग कक्ष की व्यवस्था, शिक्षक पढ़ाई छात्र पड़े भ्रष्टाचार एवं असामाजिक तत्वों से मुक्त परिसर आदि के लिए लगातार लड़ाई लड़ी। 1971 में महाविद्यालयों में कक्ष, कीड़ा मैदान, प्रयोगशाला से लेकर जल प्रबंध, शिक्षकों की व्यवस्था जैसे विषयों को लेकर देशभर में ‘परिसर बचाओ आंदोलन’ किया गया, जिसे छात्रों का व्यापक समर्थन प्राप्त हुआ।

हमारे पाठ्यपुस्तक में जब भी महापुरुषों के अपमान की बात आई हो, वह चाहे दिल्ली विश्वविद्यालय की पुस्तक विकृत रामायण (2007) की बात हो या एनसीआरटी की पुस्तकों में क्रांतिकारियों के अपमान (2004) का मामला हो, परिषद हमेशा संघर्षरत रही है।। वहीं हम राष्ट्रीय मुद्दों की बात करें तो 1974 में असम घुसपैठ के खिलाफ आंदोलन,, केरल, आंध्रप्रदेश में वामपंथी उग्रवाद के खिलाफ संघर्ष, चलो-चिकन नेक (1983) से लेकर बांग्लादेशी घुसपैठियों के विरोध में जागरण एवं अन्य आंदोलन चलाती रही। 2007 में परिषद ने बांग्लादेश की सीमाओं पर सर्वे कराया।

सर्वे ने कई आंखे खोलने वाले तथ्य उजागर किए। अभाविप ने संकट की गंभीरता को देश के नेताओं एवं एवं सामान्य जनमानस के सामने रखा एवं देश भर में इसके खिलाफ आंदोलन प्रारंभ किया। चिकन नेक क्षेत्र में लगभग 40000 छात्रों के साथ में विद्यार्थी परिषद ने 17 दिसंबर 2008 में आंदोलन किया। 1990 में श्रीनगर में तिरंगे के अपमान के जवाब में ‘जहां हुआ तिरंगे का अपमान वही करेंगे तिरंगे का सम्मान’ नारे के साथ 11 सितंबर 1990 में ऐतिहासिक रैली की गई जिसमें देशभर के छात्र श्रीनगर की ओर निकले। विद्यार्थी परिषद ने जम्मू कश्मीर में आतंकवाद के खिलाफ खड़े होकर राष्ट्र ध्वज के सम्मान में मोर्चा निकाला। छात्र हित के साथ-साथ ऐसे अनेक राष्ट्रीय मुद्दों की ओर विद्यार्थी परिषद ने छात्रों को मार्ग प्रशस्त किया। महिला सशक्तिकरण के लिए भी विद्यार्थी परिषद ने लगातार कार्य किया। विद्यार्थी परिषद के कार्य में छात्राओं को भी अहम भूमिका में रखा गया।

मिशन साहसी जैसे अभियान के माध्यम से छात्राओं को आत्मरक्षा के लिए भी पूरे देशभर में अभियान चलाया गया। वर्तमान परिस्थिति की बात करें तो जब वैश्विक महामारी कोरोना से देश संकट में था तब विद्यार्थी परिषद के कार्यकर्ताओं द्वारा देशभर में राहगीरों के लिए भोजन, आवास की व्यवस्था की एवं आरोग्य की व्यवस्था उपलब्ध कराई। परिषद द्वारा समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए जहां पर डॉक्टरी सुविधा उपलब्ध नहीं हो पा रही थी, ऐसी झुग्गी-बस्तियों में जाकर स्क्रीनिंग, ऑक्सीजन की जांच एवं हल्के लक्षण पाए जाने वाले व्यक्तियों को निशुल्क दवाई वितरित की गई।

साथ ही जरूरतमंद लोगों के भोजन, राशन एवं दैनिक क्रिया के लिए आवश्यक सामग्री का प्रबंधन कराया गया। ऐसे संकट के काल में भी विद्यार्थी परिषद का कार्यकर्ता अपने एवं अपने परिवार की चिंता न करते हुए, यह संपूर्ण समाज मेरा परिवार है, इस भाव के साथ कोराना काल में सेवा कार्य करता हुआ नजर आया। ‘जहां कम-वहां हमÓ की भूमिका में विद्यार्थी परिषद का प्रत्येक कार्यकर्ता समाज के साथ कंधे से कंधा मिलाकर इस संकट काल में खड़ा रहा।

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