Home लेख 7 अक्टूबर जयंती विशेष : क्रांतिकारी दुर्गा भाभी

7 अक्टूबर जयंती विशेष : क्रांतिकारी दुर्गा भाभी

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भारतीय स्वाधीनता संग्राम के क्रांतिकारी आंदोलन ने लोगों को अंग्रेजों के भय से मुक्त किया। स्वाधीनता के लिए उठ खड़ा होने की नैतिक चेतना प्रदान की। क्रांतिवीरों से प्रेरित होकर स्वाधीनता सेनानियों की पीढ़ी निर्मित हुई। 1925 से 1931 तक चले क्रांतिकारी आंदोलन में महिलाओं की भी सक्रिय भागीदारी थी। इन क्रांति वीरांगनाओं में दुर्गा भाभी आंदोलन की इनर व्हील थी। दुर्गा भाभी ग्रामीण परिवेश के एक सामान्य मध्यमवर्गीय परिवार में जन्मी थीं।

उनका विवाह प्रसिद्ध क्रांतिकारी भगवतीचरण वोहरा के साथ हुआ। जीवन भर संघर्ष और राष्ट्र की स्वाधीनता के लिए अपना जीवन लगा देने वाली दुर्गा भाभी दो बड़े ऑपरेशन के लिए प्रसिद्ध हैं। 17 दिसंबर 1928 को सांडर्स वध के बाद वे ही सरदार भगतसिंह को लाहौर से सुरक्षित निकालकर कलकत्ता ले गई थीं। भगवतीचरण जी ने काम की बेहतरीन सफलता के लिए अपनी पत्नी की पीठ थपथपाई।

इस घटना के मुश्किल से डेढ़ साल बाद 28 मई 1930 को क्रांतिकारी भगवतीचरण की लाहौर में एक बम का परीक्षण करते समय मौत हो गई और तब दुर्गा भाभी को अमर वीर चंद्रशेखर आजाद ने संरक्षण दिया। उन्हीं के संरक्षण में पंजाब में आतंक मचाने वाले मुंबई के गवर्नर हेली को प्राण दंड देने की योजना बनी। इस एक्शन का दायित्व दुर्गा भाभी ने लिया। उनके सहयोगियों में थे – बाबा पृथ्वी सिंह और सुखदेवराज। यह तय हुआ कि दुर्गा भाभी एक पारसी महिला के लिबास में अपनी कार में बैठकर गवर्नर से मिलने उनके बंगले पहुंचेंगी और भेंट के समय बातों में उलझाकर उन पर गोलियां दाग देंगी।

दुर्गा भाभी, बाबा पृथ्वी सिंह और सुखदेव राज कार में सवार होकर गवर्नर के बंगले की तरफ पहुंच गए। गवर्नर बंगले पर नहीं था। जहां-जहां उसके मिलने की संभावना हो सकती थी, उन स्थानों पर उसे तलाश किया गया, पर वह कहीं नहीं मिला। घूमते-फिरते काफी रात हो गई। गवर्नमेंट हाउस के पास लेमिंगटन रोड पर एक पुलिस स्टेशन पर अधिकांश स्टाफ गोरे लोगों का ही था। रात्रि के लगभग एक बजे का समय था। पुलिस की एक गाड़ी उस समय वहां आकर रुकी। क्रांतिकारियों ने समझा कि संदिग्ध व्यक्ति समझकर पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने पहुंची है। पृथ्वीसिंह ने आदेश दिया शूट यह सुनते ही दुर्गा भाभी ने महिला को छोड़कर पुलिस के शेष लोगों पर गोलियां दागना प्रारंभ कर दिया।

पृथ्वी सिंह और सुखदेव राज भी गोलियां चलाने लगे। क्रांतिकारियों पर भी गोलियों की बौछार की गई। काफी गोलियां चलाने के बाद ये लोग लौट पड़े। मुंबई में दस व्यक्तियों पर लेमिंगटन शूटिंग केस चला। बाद में इसका नाम बंबई शूटिंग केस हो गया। यह मुकदमा पहले सेशन कोर्ट में चला और बाद में हाईकोर्ट में। 4 मई 1931 को हाईकोर्ट ने फैसला सुना दिया। सभी व्यक्ति निर्दोष घोषित कर दिए गए।

27 फरवरी 1931 को इलाहाबाद के अल्फ्रेड पार्क में चंद्रशेखर आजाद ब्रिटिश पुलिस के साथ युद्ध करते हुए शहीद हो गए। इसके बाद दुर्गा भाभी का जीवन संकट से घिर गया। पुलिस उनका पीछा कर रही थी। दुर्गा भाभी को स्वयं से कहीं अधिक चिंता अपने पुत्र शचींद्र की थी। साहस और सूझबूझ ने कभी दुर्गा भाभी का साथ नहीं छोड़ा। जब दुर्गा भाभी लाहौर पहुंची तो उन्हें वहां गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें छह महीने तक नजरबंद रखा गया। बाद में उन्हें लाहौर में ही तीन वर्ष तक नजरबंद रखा गया। नजरबंदी की अवधि समाप्त होने पर वे गाजियाबाद पहुंच गई और वहां प्यारेलाल कन्या विद्यालय में अध्यापिका हो गई।

गाजयि़ाबाद में कुछ दिन रहने के पश्चात दुर्गा भाभी दिल्ली पहुंच गई और कांग्रेस में कार्य करने लगी। उनके तप और कमर्ठता से प्रभावित होकर उन्हें दिल्ली प्रदेश कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष के रूप में निर्वाचित किया गया। इस पद पर बहुत समय तक कार्य करने के पश्चात दुर्गा भाभी ने स्वाधीन भारत में लखनऊ को अपना स्थायी निवास बनाया और वहां नन्हें-मुन्नों में राष्ट्रीय संस्कार डालने के उद्देश्य से एक मांटेसरी विद्यालय खोलकर अपनी सारी शक्ति उसके संचालन के लिए अर्पित करने लगी। राष्ट्र के लिए समर्पित दुर्गा भाभी का जीवन सभी के लिए प्रेरणास्त्रोत है।

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