28 अक्टूबर जयंती : भारत की भगिनी- निवेदिता

Share on facebook
Facebook
Share on twitter
Twitter
Share on linkedin
LinkedIn
Share on pinterest
Pinterest
Share on pocket
Pocket
Share on whatsapp
WhatsApp

रंजना चितले, कथाकार व स्तंभकार

भारतीय पुनर्जागरण, राष्ट्रवाद के उत्थान और स्वाधीनता संघर्ष की महत्वपूर्ण कड़ी है। पुनर्जागरण ने जहां सामाजिक अत्याचार और पूर्वाग्रहों के विरुद्ध संघर्ष छेड़ा वहीं सांस्कृतिक विकास के अन्य रूपों के पुनरोदय के लिए उत्कृष्ट प्रयास किया। यह राष्ट्रीय आंदोलन के समानांतर ही नहीं चला, बल्कि अनेक अवसरों पर दोनों एक-दूसरे के साथ गुंथ गये। इस प्रयास में भारतीय स्त्री-पुरुषों के अलावा विदेशी महिलाओं ने भी अपनी भूमिका और योगदान से उत्कृष्टता प्रदान की। विदेशी महिलाओं में भारत के लिए आवाज बुलंद करने वालों में से एक स्वामी विवेकानंद की अनुयायी भगिनी निवेदिता थी।

जो भारतीय न होने के बावजूद हमारे आदर्शों और हमारी आकांक्षाओं के साथ आत्मसात हो गई और अपने जीवन को स्वेच्छा से भारत और भारतवासियों के साथ जोड़ लिया। माग्ररेट नोबल का जन्म आयरलैंड में जॉन नोबल के यहां 28 अक्टूबर 1867 को हुआ। दीन-दुखियों की सेवा के संस्कार पिता से मिले। बाद में आयरलैंड के होमरूल (स्वराज) आंदोलन में माता-पिता की सक्रिय भागीदारी ने माग्ररेट के अंतस में राष्ट्रीयता के भाव अंकुरित किए।

अपने पिता के देहावसान के बाद मात्र 17 वर्ष की आयु में अध्यापन कार्य करने लगी। धर्म की आधारभूत अवधारणाओं को लेकर विचारवान माग्ररेट का शंकित मन समाधान की तलाश में था। उसी दौरान स्वामी विवेकानंद अमेरिका की यात्रा और शिकागो में धर्म संसद के समक्ष भाषण के उपरांत लंदन पहुंचे। स्वामी जी से प्रथम मुलाकात लेडी मारगेसन के यहां हुई। दूसरी मुलाकात में भाषण सुनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। पिकाडिलि के प्रिंसेस हाल में स्वामी जी द्वारा आत्मज्ञान संबंधी की गई व्याख्या सुनकर वे अभिभूत हो गई।

भारतीय संस्कृति और सभ्यता को लेकर मन में बना खाका साक्षात दिखाई दिया। वेदांत दर्शन की इतनी व्यापक व्याख्या शायद ही कोई कर सके यह भान होते ही उन्होंने भारत आने का मन बना लिया। सर्वप्रथम स्वामी विवेकानंद जी ने माग्ररेट को भारत की स्थिति और आने वाली कठिनाईयों से अवगत कराया। अपने फैसले पर अटल माग्ररेट नोबल 28 जनवरी 1898 को भारत आयीं।

भारतीय संस्कृति औऱ ज्ञान को समझने वाली इस आयरिश तपस्विनी को स्वामी विवेकानंद ने नाम दिया निवेदिता। साथ में गुरु मंत्र दिया लव इंडिया-सर्व इंडिया, भारत को प्यार करो, भारत की सेवा करो। निवेदिता ने अपने गुरु के इस मंत्र का अक्षरक्ष: पालन किया। वह भारतभूमि में रच-बस गयीं। भारत, भारतवासी, भारतीय संस्कृति, भाषा, दर्शन, भारत की स्वाधीनता के लिए स्वयं का उत्सर्ग किया और निवेदिता का साकार रूप बन गई।

लगभग 14 वर्षों तक भारतीयों में शिक्षा और जागरण का आह्वान किया तथा स्वाधीनता संग्राम में अपनी तरह का योगदान दिया। उन्होंने 1902 में बड़ौदा में रहकर श्री अरविंद के कार्य को करीब से देखा। वहां से कलकत्ता आकर क्रांति की अलख जगाने के लिए क्रांतिकारियों को अपने पुस्तकालय की बौद्धिक उपज भेंट की। उन्होंने सुप्रसिद्ध पुस्तकें-गुरुजी जैसा मैंने उन्हें पाया (द मास्टर एज आई सॉ हिम) यात्रा वृत्त, हिंदुस्तान में पालने की कथाएं आदि कृतियों के अलावा यात्राओं के संस्मरण भी लिखे।

Never miss any important news. Subscribe to our newsletter.

Leave a Reply

Your email address will not be published.

Recent News

Related News