सभ्यता की नदी सिंधु दर्शन यात्रा के 25 वर्ष

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सिंधु नदी हमारी सभ्यता की जननी है। वेदों में इसकी स्तुति गाई गई है। इसी नदी के तट पर सिंधु सभ्यता का जन्म हुआ, जिससे बाद में भारतीय सभ्यता और संस्कृति विकसित हुई। इसी के नाम से विदेशियों ने भारत को हिंदुस्तान कहा । भारत विभाजन के बाद इस नदी का बड़ा भाग पाकिस्तान में चला गयाा। एक छोटा सा हिस्सा लद्दाख से होकर प्रवाहित होता है। भारतीयों को इस महान सरिता के माध्यम से अपनी विरासत से जोडऩे के लिए वर्ष 1997 में सिंधु दर्शन यात्रा प्रारंभ की गई थी, जिसके इस साल 25 वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर 7 से 14 अगस्त तक सिंधु कुंभ आयोजित होगा।

  • इंद्रेश कुमार

सिंधु नदी भारत के अस्तित्व और सभ्यता के विकास को बताने वाली नदी है। सिंधु के पार के इस भूभाग को हिंदुस्तान कहा गयाा। यह नदी दुनिया की सबसे बड़ी नदियों में से एक है जिसके तट पर एक प्राचीन सभ्यता फली-फूली। यह पाकिस्तान, भारत (जम्मू और कश्मीर) और चीन (पश्चिमी तिब्बत) से बहती है। भारत में इसका छोटा सा हिस्सा लद्दाख में ही देखने को मिलता है। समुद्र सी विशालता के कारण इसे सिन्धु कहा गया।

नदी का उद्गम स्थल, तिब्बत के मानसरोवर के निकट सिन-का-बाब नामक जलधारा माना जाता है। इस नदी की लंबाई प्राय: 3610(2880) किलोमीटर है। यहां से यह नदी तिब्बत और कश्मीर के बीच बहती है। नंगा पर्वत के उत्तरी भाग से घूम कर यह दक्षिण पश्चिम में पाकिस्तान के बीच से गुजरती है और फिर जाकर अरब सागर में मिलती है। इस नदी का ज्यादातर अंश पाकिस्तान में प्रवाहित होता है। यह पाकिस्तान की सबसे लंबी नदी और राष्ट्रीय नदी है। सिंधु की पांच उपनदियां हैं। इनके नाम हैं: वितस्ता, चन्द्रभागा, ईरावती, विपासा एंव शतद्रु. इनमें शतद्रु सबसे बड़ी उपनदी है। सिन्धु घाटी सभ्यता (3300-1700 ई.पू.) विश्व की प्राचीन नदी घाटी सभ्यताओं में से एक प्रमुख सभ्यता थी।

ऋग्वेद में कई नदियों का वर्णन किया गया है, जिनमें से एक का नाम ‘सिंधु’ है। ऋग्वैदिक ‘सिंधु’ को वर्तमान सिंधु नदी माना जाता है। यह अपने पाठ में 176 बार, बहुवचन में 94 बार और सबसे अधिक बार ‘नदी’ के सामान्य अर्थ में उपयोग किया जाता है। सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख शहर, जैसे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो, लगभग 3300 ईसा पूर्व के हैं, और प्राचीन विश्व की कुछ सबसे बड़ी मानव बस्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं।

इस नदी का भारत की नई पीढ़ी से साक्षात कराने और उसकी महत्ता को आत्मसिक्त करने के लिए 1997 में सिंधु उत्सव शुरू किया। तब लालकृष्ण आडवाणी भारत के गृह मंत्री बने। वे सिंधी थे, इसलिए सिंधु नदी के प्रति उनका लगाव भी अधिक था। उनके मन में भी आया कि सिंधु केंद्रित कोई कार्यक्रम कर व उसमें भागीदारी करके एक नये इतिहास को पुन: जीवित किया जाए। इस उत्सव के इस साल पच्चीस वर्ष पूरे हो रहे हैं। इस अवसर पर 7 अगस्त से 11 अगस्त तक सिंधु कुंभ आयोजित किया जा रहा है। सिंधु दर्शन यात्रा के संस्थापक सदस्यों में से एक इन्द्रेश कुमार जी से चर्चा की हिंदू विवेक ने। प्रस्तुत हैं उस चर्चा के प्रमुख अंश-

यात्रा को लगभग दो दशक पूरे हो चुके है। उस समय से लेकर अभी तक इस यात्रा में क्या-क्या परिवर्तन हुए है?

यात्रा प्रारंभ करने से पूर्व वहां जो राजनैतिक लोग थे, कांग्रेस के लोग थे, कुछ कट्टरपंथी लोग थे, उन्होंने एक प्रोपेगैंडा करना शुरू किया कि यह यात्रा बौद्धों को हिन्दू बनाने के लिए की जा रही है। इसलिए लद्दाख के बौद्ध समाज में हलचल शुरु हो गयी और जिसमें कहा गया कि यह बौद्धौं को हिन्दू बनाने वाली यात्रा है। इसलिए वहां एक प्रस्ताव उठा कि सिंधु नदी के दो टैंकर पानी भरकर एक ग्यारह अशोक रोड और एक आरएसएस के झंडेवालान कार्यालय में भेज दिया जाए, जिससे वे लोग वहीं नहा लें। यात्रा के नाम पर लद्दाख आकर बौद्धों को हिन्दू बनाने का और बौद्ध मत को लुप्त करने का काम नहीं करने दिया जाएगा। उनकी इस गलतफहमी को दूर करने के लिए उनके साथ कई बैठकें हुईं जिसमें एक सौहार्द का वातावरण बना।

फिर जब उनको यह पता लगा कि इससे आर्थिक विकास भी होगा, धर्मों में समन्वय, शांति और भाईचारे का वातावरण बनेगा तब वहां एक सर्व व्यापक समर्थन मुखर रूप से इस उत्सव के लिए बनने लगा। जब यह प्रश्न उठा कि सिंधु के किनारे उत्सव कहां मनाया जाए तो शेय गांव की भूमि उपयुक्त लगी। गांव के लोगों ने भी अपना समर्थन दिया।

सन 1997 में लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्व में यह यात्रा अपने स्वरूप को ग्रहण करने के लिए चल पड़ी। यह यात्रा जब चल रही थी, तो अकस्मात इस पर एक और राजनीतिक प्रहार हुआ। सन 2004 में सत्ता परिवर्तन हुआ और फिर से कांग्रेस की सरकार आयी। उन्होंने इसे राजनीतिक नजरिए से देखा। राजनीतिक द्वेष के कारण उन्होने सिंधु उत्सव का नाम बदलकर सिंघे के खबब यानी जहां से सिंधु निकलती है वहां का लोकल नाम था उसका नाम दिया। इस यात्रा को जो मदद दी जाती थी वह भी रोक दी गई। यह यात्रा धीरे-धीरे एक स्थानीय यात्रा बना दी गई। बौद्धों का सहयोग तो हमारे साथ था परंतु केंद्र और राज्य सरकार पूरी तरह से विद्वेष में जा चुकी थी। इसलिए यह तय किया गया कि इस यात्रा को बिना सरकारी खर्चे के पूरा किया जाएगा।

2014 में जब मोदी सरकार सत्ता में आई तब यात्रा में क्या बदलाव हुए?

केंद्र में सरकार का परिवर्तन हुआ, राज्यों में भी परिवर्तन हुआ जिसके बाद यात्रा बढ़ती गई। लेकिन हमने यह निर्णय लिया कि सरकार स्वेच्छा से विचार कर यात्रा हेतु कुछ सहयोग करें तो करे लेकिन हम यात्रा को पूरी तरह से जन केंद्रित, यात्री केंद्रित ही रखेगे। यात्री अपने आने-जाने का, रहने-खाने का, वहां जो उत्सव का आयोजन होगा, उस पर जो खर्चे होंगे, वह यात्री ही करेगा। 2014 तक यह यात्रा बहुत बड़ा स्वरूप ग्रहण कर चुकी थी। लद्दाख में लेह और कारगिल दो जिले हैं, उनमें विदेशी पर्यटन 4 गुना तक बढ़ा गया था जबकि भारतीय पर्यटन 15 से 20 गुना बढा था। लद्दाख को पर्यटन के कारण करोड़ों की आमदनी होने लगी।

इस वर्ष की यात्रा कोरोना कालखंड में होने जा रही है, इसका क्या प्रभाव पड़ सकता है?

23वीं यात्रा तक तो कोरोना काल नहीं था। 24वीं यात्रा अर्थात 2020 की यात्रा कोरोना से प्रभावित हुई। इस वर्ष भी इसे जून में नहीं कर सके। जब यह दिखने लगा कि कोरोना का असर जुलाई-अगस्त में कम हो जाएगा तब हमने इसे एक छोटी यात्रा के रूप में सवा सौ डेढ़ सौ यात्री के साथ करने का निश्चित किया जिससे यात्रा का सातत्य बना रहे। हालांकि दो साल पहले हम यह तय कर चुके थे कि 25वें सिंधु उत्सव को हम सिंधु कुंभ के रूप में मनाएंगे। इसे बड़ा और दो चरण में करेंगे ऐसा संकल्प किया गया था। चारों तरफ से लोग बहुत इच्छुक हैं आने के लिए और धीरे-धीरे वातावरण भी बन रहा है। अब 7 अगस्त से 11 अगस्त के बीच यह सिंधु कुंभ होगा।

इस कुंभ हेतु क्या विशेष इंतजाम किये गये हैं?

इस बार कुछ बातों पर विचार किया गया है। जो रेल मार्ग या सड़क मार्ग से आएंगें वे दिल्ली से चलेंगे। वे दिल्ली से जम्मू आयेंगे, जम्मू से श्रीनगर, श्रीनगर से कारगिल व लेह जायेगें। जबकि दूसरा बैच दिल्ली से सड़क मार्ग से चंडीगढ़, कुल्लू-मनाली से अटल टनल से होते हुए जाएगा। आरोग्य व्यवस्था हेतु जम्मू, श्रीनगर, कारगिल, चंडीगढ़ और लेह में लोगों को भेजना शुरु कर दिया गया है। यहां ऑक्सीजन, बेड, ऑक्सीमीटर और मेडिसिन की पूरी व्यवस्था की गई है।

यहां पर ऐलोपेथिक, होम्योपैथिक, आयुर्वेद सभी की व्यवस्था भी की जायेगी। जिससे यात्रियों को यह विश्वास हो कि यहां यात्रा के दौरान उनकी पूरी देखभाल की जा रही है। महामारी को देखते हुए भोजन की व्यवस्था की जा रही है जो स्वास्थ्य के लिए लाभदायक होगा। इसके साथ-साथ सबको सूचना जा रही है कि कार्यक्रम के दौरान सभी को सोशल डिस्टेंसिंग सहित सभी कोरोना नियमों का पालन करना है। पानी का अधिक सेवन करें।

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