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उस सैन्य अभियान के 108 घंटे

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  • 18 सितम्बर 1948 निजाम का समर्पण और हैदराबाद भारत का अंग बना

हैदराबाद सेना ने 13 सितम्बर को हैदराबाद में प्रवेश किया, 17 सितम्बर की शाम को हैदराबाद के निजाम ने समर्पण किया और 18 सितम्बर को विलीनीकरण दस्तावेज पर हैदराबाद के शासक निजाम के हस्ताक्षर हुये ।

  • रमेश शर्मा, वरिष्ठ पत्रकार
    rsharmamdn@yahoo.co.in

पूरे संसार में केवल भारत ऐसा देश हैं जहां स्वतंत्रता के बाद भी स्वतंत्र स्वरूप लेने के लिये भी लाखों बलिदान हुये और करोड़ो लोग बेघर हुये। जिन स्थानों पर स्वतंत्रता के बाद भी भारी हिंसा और संघर्ष हुआ उनमें एक हैदराबाद रियासत भी है जहाँ सेना के हस्तक्षेप के बाद ही हिंसा रुक सकी और और वह भूभाग भारतीय गणतंत्र का अंग बन सका। सेना ने 13 सितम्बर को हैदराबाद में प्रवेश किया, 17 सितम्बर की शाम को हैदराबाद के निजाम ने समर्पण किया और 18 सितम्बर को विलीनीकरण दस्तावेज पर हैदराबाद के शासक निजाम के हस्ताक्षर हुये।
स्वतंत्रता के पूर्व भारत में तीन प्रकार का प्रशासनिक स्वरूप था। एक जो सीधा अंग्रेजों के आधिपत्य में था, दूसरा वह अंग्रेजों का ध्वज और दासता तो थी किंतु निचले स्तर पर किसी राजा या नबाब का शासन था। और तीसरा डच या फ्रांसीसी सत्ता के हाथ।

जून 1947 में वायसराय माउंटबेटन द्वारा बनाये गये फार्मूले से 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्रता तो मिली पर यह स्वतंत्रता केवल ब्रिटिश आधिपत्य वाले क्षेत्रों तक ही सीमित थी। अंग्रेज जा तो रहे थे लेकिन वे एक ऐसे भारत की नींव बनाकर जा रहे थे जो सतत गृह कलह और रक्तपात में ही उलझा रहे। उन्होंने एक चाल चली। अंग्रेजों ने भारतीय रियासतों को भी स्वतंत्रता दी थी और उनसे कहा था कि वे चाहें तो स्वतंत्र रहें अथवा भारत या पाकिस्तान किसी में मिल लें। इसका लाभ कुछ रियासतों ने उठाया उसमें हैदराबाद भी थी।

सभी रियासतों को जून 1947 में ही इस फार्मूले की सूचना मिल गयी थी। सूचना मिलते ही जून 1947 में हैदराबाद के शासक निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र रहने का पत्र भेज दिया था और स्वतंत्र रहने की तैयारी आरंभ कर दी थी। निजाम को इस काम में अंग्रेजों का मौन और मोहम्मद अली जिन्ना का खुला समर्थन मिल गया था, । लेकिन हैदराबाद रियासत की जनता निजाम शासन से मुक्ति चाहती थी। वह भारतीय गणतंत्र का हिस्सा बनना चाहती थी। हैदराबाद रियासत में बहुमत तो हिन्दू परंपरा को मानने वालों का था लेकिन वहां कानून इस्लामिक शरीयत के अनुसार चलता था। यह कानून हैदराबाद में 1720 से ही लागू हो गया था। यह निजाम शाही के आरंभ होने का वर्ष था। और जब 1798 में निजाम अंग्रेजों के आधीन हो गया तब भी आतंरिक शासन व्यवस्था में कोई अंतर न आया।

हैदराबाद में धार्मिक सत्ता के अधिकारों का दुरुपयोग, बहुसंख्यक समाज का शोषण और उत्पीडऩ का क्रम बना रहा । इसलिये हैदराबाद का बहुसंख्यक निजाम से मुक्ति चाहता था। हैदराबाद के नबाब को ‘निजाम-उल-मुल्क की उपाधि मुगल बादशाह ने दी थी जिससे हैदराबाद का हर नबाब निजाम कहलाया । रियासत का आधिकारिक धर्म ही इस्लामिक प्रावधानों के अनुसार नहीं था अपितु अधिकांश शासकीय पदों पर भर्ती भी मुस्लिम समाज के लोगों की जाती थी। शीर्ष पदों पर तो एक भी गैर मुस्लिम नहीं था। रियासत को अंग्रेजों ने अपने आधीन तो कर लिया था पर रियासत के अदरूनी व्यवस्था में कोई हस्तक्षेप नहीं किया था। इसका कारण यह था कि अंग्रेजों को शासन व्यवस्था में कोई रूचि न थी। उनके केवल दो उद्देश्य थे। एक तो हैदराबाद रियासत से सालाना पैसा मिले और दूसरा आवश्यकता पडऩे पर निजाम उनकी सहायता के लिये अपने खर्चे पर सेना भेजे। निजाम इस काम को सहर्ष कर रहा था।


अंग्रेजों को निजाम की जरूरत मराठों के विरुद्ध अभियान शुरु करने के लिये पड़ती थी। इसलिए उन्होने निजाम को कुछ विशेष अधिकार भी दे रखे थे। निजाम के मन में मराठा शासन के प्रति कितनी कटुता थी इस बात का अनुमान इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब मराठों ने भोपाल में अभियान चलाया तो भोपाल नबाब की मदद करने के लिये निजाम की फौज भोपाल आई थी। यह अलग बात है कि भोपाल के युद्ध में इस संयुक्त फौज को भी पराजय का मुंह देखना पड़ा।। निजाम इससे पूर्व भी मराठों से पराजित हो चुका था इसलिये उसने अंग्रेजों से संधि कर ली थी।

निजाम का सोच कितना साम्प्रदायिक था इसका एक उदाहरण यह भी है कि हैदराबाद रियासत में मुस्लिम आबादी केवल 11त्न प्रतिशत थी लेकिन रियासत की तीस प्रतिशत भूमि पर मुसलमानों का अधिकार था। इसके साथ वहां हिन्दुओं को हथियार रखने का अधिकार न था जबकि मुस्लिम समाज के पास हथियारों का जखीरा रहता था। हैदराबाद की इस विशिष्ट विचार और कार्य शैली कटुता और आक्रामकता 1921 के बाद और बढ़ी। यद्धपि रियासत के अधिकांश मुसलमान धर्मान्तरित थे।उन्हे इसका आभास भी था लेकिन खिलाफत आँदोलन के बाद मुसलमानों में संगठन और आक्रामकता दोनों बढ़ी। अनेक स्थानों पर साम्प्रदायिक दंगे भी हुये।


इसमें तेजी 1927 के बाद और बढ़ी इस वर्ष रियासत में एक संस्था ‘मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन का गठन हुआ । इसका नेतृत्व सैय्यद कासिम रिजवी के हाथ में था। इस संस्था ने सशस्त्र समूह बनाया इसे ‘रजाकारों का संगठन कहा गया। इस संगठन ने 1946 के डायरेक्ट ऐक्शन में बड़ी सक्रियता दिखाई और मुस्लिम समाज में अपनी पैठ और बढ़ा ली थी । इसके साथ जैसे जैसे स्वतंत्रता के क्षण समीप आ रहे थे यह संगठन और गहरी पकड़ बनाने लगा। 1946 के बाद निजाम इसी संगठन पर निर्भर हो गये थे। जून 1947 से हैदराबाद निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र रहने की तैयारी आरंभ कर दी थी।

15 अगस्त 1947 को निजाम ने स्वयं को स्वतंत्र होने की और कासिम रिजवी ने इसे इस्लामिक देश होने की घोषणा कर दी। इस घोषणा के साथ हैदराबाद रियासत में हिंसा की शुरुआत हो गयी। रजाकारों और रियासत की सेना मिलाकर यह संख्या लगभग दो लाख थी जो हथियारों से युक्त थी अनेक स्थानों पर दमन लूटपाट, हत्या, बलात्कार और धर्मान्तरण का सिलसिला चल पड़ा। सैकड़ो हजारों परिवार सुरक्षित स्थानों की ओर भागे। आरंभ में भारत सरकार कश्मीर पर पाकिस्तान का हमला विभाजन के साथ बढ़ती हिंसा और शरणार्थियों की समस्या से जूझ रही थी इस कारण हैदराबाद की ओर ध्यान कम गया।

तभी 1948 के आरंभ में यह सूचना मिली कि हैदराबाद में पाकिस्तान से सशस्त्र सैनिक आ रहे हैं, उन्हें बसाया जा रहा है और रियासत ने हथियारों की खरीद के लिये आस्ट्रेलिया और चेकोस्लोवाकिया से 30 लाख पाउंड के हथियार खरीदने के आर्डर दिया है। तब तत्कालीन गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने निजाम से बातचीत की किंतु निजाम के रवैये में कोई अंतर न आया। उल्टे रिजवी की रजाकारों की गतिविधियां और बढ़ी। सरदार पटेल ने अंतत: 9 सितम्बर 1948 को चेतावनी पत्र जारी किया ।

लेकिन निजाम न माना। 11 सितम्बर को हैदराबाद में सैन्य अभियान का निर्णय हुआ। इस अभियान को ‘आपरेशन पोलोÓ नाम दिया गया। 12 सितम्बर को सेना को कूच करने का आदेश दिया। 13 सितम्बर को सेना ने हैदराबाद आपरेशन आरंभ किया, 17 सितम्बर की शाम को निजाम ने समर्पण का प्रस्ताव दिया और 18 सितम्बर को विलीनीकरण दस्तावेज पर हस्ताक्षर हुये। सेना को इस अभियान में कुल 108 घंटे लगे। इस 108 घंटे के अभियान में सेना के कुल 329 जवानों के प्राणों का बलिदान हुआ।

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