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हमास ने मनाया जीत का जश्न कितना यथार्थ

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रमेश शर्मा
पश्चिम एशिया में युद्ध विराम हो गया । गाजा पट्टी से इस्राइल पर हुये हमलों का जबाब देना इस्राइल ने बंद कर दिया है । इसकी पहल अमेरिका ने की थी और मिस्र ने मध्यस्थता । पर प्रश्न उठता है कि वहाँ यह शाँति कब तक रहेगी और कब तक युद्ध विराम टिकेगा ? चूंकि युद्ध विराम के कुछ घंटो बाद ही फिलीस्तीनियों ने अल अक्शा मस्जिद में उत्पात मचाना शुरू कर दिया । यह वही अल अक्शा मस्जिद का परिक्षेत्र है जहाँ से इस ताजा संदर्भ की शुरुआत हुई थी । यह विवाद लगभग बाईस दिन चला । कमोबेश बाईस दिन चले इस विवाद या युद्ध में जानी नुकसान तो कम हुआ पर गाजा पट्टी में संपत्ति का नुकसान अधिक हुआ । और इसमें मिसाइलों और राकेट का जमकर इस्तेमाल हुआ । यदि दोनों पक्षों के राकेट और मिसाइलों की गणना करें तो इन दोनों की संख्या आठ हजार के आसपास पहुँचती है । इससे अंदाज लगाया जा सकता है दोनों अपने संघर्ष में कितने दृढ़ थे । बेशक यह संघर्ष केवल गाजा पट्टी तक सिमटा हुआ था पर इसमें कुछ बाहरी शक्तियाँ अधिक दिलचस्पी ले रहीं थीं । इनमें चीन जैसा कुटिल और अफगानिस्तान, पाकिस्तान और तुर्की जैसे कट्टरपंथी देश सक्रिय हो गये थे । चीन की सक्रियता देख अमेरिका ने भी दिलचस्पी दिखाई । इसलिए इसकी आँच आधी से ज्यादा दुनियाँ पर आ रही थी । विवाद के पहले दिन से पाकिस्तान, ईरान अफगानिस्तान और तुर्की ने इसे मुद्दा बना लिया है । और दुनियाँ के सभी इस्लामिक देशों को संगठित करने का अभियान चलाया । उनके अभियान में यह विन्दु नहीं था कि विवाद की वजह क्या है और इसका समाधान क्या है । वे इसे इस्लाम के समर्थन का मुद्दा बना रहें हैं तो चीन इस्लामिक दुनियाँ में अमेरिका के खिलाफ हवा बनाने में जुट गया है ।
इस विवाद की शुरुआत एक मई से हुई । तब रमजान का महीना था । हजारों की भीड़ अल-अक्शा मस्जिद क्षेत्र में एकत्र हो गयी थी । यह भीड़ फिलीस्तीनियों की थी । यह माना जा रहा है कि इसके पीछे हमास की योजना थी । पश्चिम एशिया में अल-अक्शा मस्जिद ठीक उसी प्रकार विवाद और संघर्ष के केन्द्र रही है जैसी भारत में अयोध्या राम जन्मभूमि स्थल । पश्चिम एशिया में अल-अक्शा परिसर यहूदी, ईसाई और इस्लाम तीनों धर्म के अनुयायियों के लिये मान और आदर का केन्द्र है । यहूदियों का दावा है कि वह उनके धर्म का पवित्र स्थल है जिसका निर्माण ईसा से सातवीं शताब्दी पूर्व हुआ था जबकि इस्लाम के अनुयायियों के लिये यह दुनियाँ का वह तीसरा पवित्र स्थल है जिसकी बुनियाद स्वयं पैगम्बर मोहम्मद साहब ने रखी थी । तब से इस पर अनेक संघर्ष हुये, रक्तपात हुये । इन सब घटनाओं के कारण उस परिक्षेत्र में अनेक बंदिश लागू हैं जिसमें एक यह भी है कि अकारण और बिना अनुमति इतना समूह एकत्र नहीं हो सकता । पर उस दिन हजारों की भीड़ जमा हुई । उन्होंने उत्तेजक नारे लगाये । सुरक्षा बलों ने रोका जब बात नहीं बनीं तो बल प्रयोग हुआ । भीड़ तो तितर वितर हो गयी पर यह एक तनाव छोड़ गयी थी । वस्तुत: ये सात वे मकान थे जहाँ कभी यहूदी रहते थे किन्तु छोड़ कर चले गये थे और अब इन मकानों फिलस्तीनी रह रहे हैं । इस फैसले के विरुद्ध पुन: प्रदर्शन हुआ और जुम्मे के दिन पुन: हजारों की भीड़ अल अक्शा परिक्षेत्र में जमा हो गयी । वह फैसला बदलने पर अड़ी रही । जब किसी भी प्रकार वह भीड़ न हटी तो बल प्रयोग हुआ गोलियाँ चलीं । सुरक्षा बलों ने बल पूर्वक इलाका खाली करा लिया । इसके तुरन्त बाद गाजा पट्टी से इस्राइल पर हमले शुरु हो गये । यह हमास ने शुरू किये थे । पश्चिम एशिया में हमास वह संगठन है जिसे अमेरिका यूरोप सहित दुनियाँ के अनेक देश आतंकवादी संगठन मानते हैं उनके देशों वह प्रतिबंधित भी है लेकिन चीन के विरोध के चलते अंतर्राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद में इस संगठन पर प्रतिबंध न लग पाया । इस्राइल की सीमा ऐसे इस्लामिक देशों से घिरी है जो अक्सर तंग करते हैं । इसलिये इस्राइल ने सीमा पर सुरक्षा के तगड़े प्रबंध कर रखे हैं । उसने राकेट रोधी मिसाइलें भी तैनात रख रखीं है इसीलिए हमास के हमलों का उसे कोई विशेष नुकसान नहीं हुआ । ताजा युद्ध की शुरुआत हमास ने ही की थी उसने इस्राइल पर 3516 राकेट दागे । यह बात अलग है कि इसमें इस्राइल को अधिक नुकसान नहीं हुआ । हमास द्वारा दागे गये 90त्न राकेटों को इस्राइल के आटोमेटिक सुरक्षा सिस्टम ने बेकार कर दिये । फिर इस्राइल ने जबाबी कार्रवाई शुरू की । उसने हमास के अड्डों पर राकेट ही नहीं मिसाइल भी दागीं । लेकिन इस्राइल ने सीधा हमला न बोला, पहले चेतावनी देकर हमला किया । इस्राइल हमास के अड्डों को तो नष्ट करना चाहता था पर आबादी को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहता था । इस्राइल की चेतवनी के बाद गाजा पट्टी की आबादी यहाँ वहां से खाली हो गयी थी । इस लिये जन हानि के आकड़े नहीं बढ़े ।
हमास ने एक विशेष रणनीति से काम किया । उन्होंने हमला किया लेकिन जब जबाबी कार्रवाई शुरू हुई तो महिलाओं और बच्चों को आगे कर दिया । जिस तरह भीड़ जुटाकर तनाव पैदा करना फिर तुरन्त बाद इस्राइल पर राकेट से हमला हमास की एक रणनीति थी । ठीक उसी प्रकार हमले के बाद महिलाओं और बच्चों को आगे करना हमास की दूसरी रणनीति थी । प्रतिदिन एक दो महिलाओं और बच्चों के रोते हुये फोटो जारी किये गये । इसमें चीन समर्थित वामपंथी विचारकों का सहयोग मिला और ऐसे फोटो पूरी दुनियाँ के मीडिया को जारी हुये । इन तस्वीरों के माध्यम से यह कोशिश की गयी कि दुनियाँ की सहानुभूति मिले और विश्व जनमत इस्राइल के विरुद्ध तैयार हो । दुनियाँ में आतंकवादियो की यह रणनीति पहली नहीं है । इसकी बानगी दुनियाँ भर में अक्सर देखने मिलती है । भारत में भी अक्सर यही होता है । यह रणनीति आतंकवादी ही नहीं अपनाते दंगाई भी अपनाते हैं । भारत के कश्मीर घाटी में ऐसा हमेशा देखने को मिला । पहले सुरक्षा बलों पर हमले हुये और जब सुरक्षा बलों ने जबाबी कार्रवाई शुरू करती तो महिलाएं और बच्चे सामने आ जाते जिससे सुरक्षा बलों को कदम रोकना पड़ते थे । डेढ़ साल पहले दिल्ली में भी यही हुआ था । पूरी तैयारी के साथ योजना पूर्वक पहले हमले हुये और जब सुरक्षा बल सामने आये तो महिलाएं पत्थर लेकर सामने आईं । सुरक्षाबलों को बस्तियों में घुसने से रोका गया । यही तकनीकी हमास की रही । महिलाओं और बच्चो के तस्वीरें देखकर सबका मन पिघला । जिस अमेरिका ने पहले कहा था कि इस्राइल को अपनी सुरक्षा का अधिकार है उसी अमेरिका ने बाद में युद्ध विराम का आग्रह किया । युद्ध विराम के बाद यदि हमास के लोग जश्न मना रहे हैं तो इसका कारण यही है कि उन्होंने अमेरिका को एक कदम पीछे सोचने पल विवश किया जिसके चलते इस्राइल ने हमले रोक दिये । पश्चिम एशिया में युद्ध विराम हो जाने से दुनियाँ भर ने चैन की साँस ली है । लेकिन यह युद्ध विराम स्थाई होगा इसकी संभावना कम है । इसका कारण यह है कि फिलस्तीन की इस्लामिक दुनियाँ में कुछ लोग हैं जो न स्वयं शाँति से रहते हैं न दूसरे को रहने देते । वे किसी अन्य के स्वरूप और अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते । सबको अपने रंग में रंगना चाहते हैं । वे अपने नये धर्म स्थल बनाने पर जितना ध्यान देते हैं उससे ज्यादा इस बात पर किसी अन्य धर्म स्थल को अपने स्वरूप में कैसे बदला जाये । ऐसे संघर्ष केवल अल अक्शा में नहीं है अपितु दुनियाँ भर में रहे हैं । अंतर इतना हैं वहां आबादी के अनुपात में भी शत प्रतिशत रूपांतरण हो गया इसलिये विवाद शाँत हो गये । इससे समझने केलिये पाकिस्तान, बंगलादेश, अफगानिस्तान के प्राचीन धर्म स्थलों से समझा जा सकता है । एक समय अल अक्शा का स्वरूप भी बदल गया था लेकिन इस्राइल के अस्तित्व में आते ही सह अस्तित्व की बात चली और सभी पक्षों को अपनी आस्था व्यक्त करने की व्यवस्था बन गयी । जिसे फिलीस्तीनियों ने सहमति तो दी पर स्वीकार न किया । आंतरिक अस्वीकृति के चलते ही वहां कभी संघर्ष विराम स्थाई न हो पाता । पश्चिम एशिया में इस्राइल ने अपनी ओर से कभी युद्ध की पहल नहीं की वह सह अस्तित्व का पक्षधर है । ठीक वैसे ही जैसे भारत अपने पड़ौसी पाकिस्तान या चीन के साथ सह अस्तित्व के संबंध चाहता है पल ये दोनों न स्वयं चैन से रहते हैं न भारत को रहने देते हैं । पाकिस्तान के भीतर भी कुछ ऐसी ताकतें हैं जो जुबान से तो इस्लाम की बात करतीं हैं पर भीतर शाँति और मानवता विरोधी रवैया अपनातीं हैं । वे इंसानियत को प्राथमिकता देने के उस सिद्धांत पर चलते ही नहीं जो इस्लाम की पहली शर्त है । इस संघर्ष में भी पाकिस्तान अफगानिस्तान तुर्की आदि देशों ने यह नहीं कहा कि अशांति की शुरुआत हमास प्रायोजित है । क्यों अल अक्शा में भीड़ एकत्र हुई या क्यों हमास नै राकेट दागे । दुनियाँ में 57 इस्लामिक देश हैं ।ओ आई सी इनका संगठन यनि आर्गेनाइजेशन आफ इस्लामिक कोआपरेशन ने बैठक बुलाई जिसमें कुछ देशों ने इस्राइल के खिलाफ एक जुट होने की अपील की थी पर अरब अमीरात, वेहरीन, सूडान आदि देश हमास की आक्रामकता के पक्षधर नहीं थे लिहाजा बैठक बेनतीजा रही । और मिश्र समहति के लिये आगे आया । मिश्र ने ही अमेरिका से आग्रह किया जिसके चलते अमेरिका ने इस्राइल से बातचीत की और फिलहाल युद्ध विराम हो गया । पर यह अस्थाई होगा इसकी झलक हमास के उत्सव और आतिशबाजी चलाने में दिख रही है ।

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