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सैनिक आक्रोश और पहली लड़ाई की अंगड़ाई

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1857 में बंगाल में अंग्रेजी-सत्ता को जड़-मूल से उखाड़ फेंकने को सन्नद्ध हुए विद्रोही सिपाहियों के मुख से पहले-पहल ‘हिंदुस्तान छोड़ दो’ का नारा आकाश में गूंजा था। इस सैन्य आक्रोश को लक्ष्य करके ही फिरंगी हुकूमत के खिलाफ जो व्यापक और स्व-स्फूर्त विद्रोह विस्फोटक रूप में प्रगट हुआ, उसे अंग्रेज इतिहासकार केवल ‘गदर’ कहते हैं, जबकि हकीकत में यही विद्रोह भारत का पहला ऐसा मुक्ति संग्राम था, जिसकी शहादत की शृंखला ने इसे देशव्यापी लोक के संग्राम में बदल दिया था और इसी प्रतिफल 15 अगस्त 1947 देश को मिली आजादी थी। 1857 के आने तक भारत को कंपनी सरकार की गुलामी का जुआ लादे हुए सौ वर्ष पूरे हो रहे थे। 23 जून 1857 को पलासी की लड़ाई की शताब्दी वर्ष के उपलक्ष में अंग्रेज सेना में शामिल भारतीय सैनिकों ने एक ही दिन विद्रोह का झंडा फहराने और अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध सतत संघर्ष का संकल्प लिया था। गोपनीय ढंग से इस सूचना का क्रम लाल कमल के फूलों और चपातियों के माध्यम से आधिकांश सैनिक छावनियों में किया जा रहा था। सैनिक नेतृत्वकर्ताओं ने संघर्ष का यह समय बड़ी सूझबूझ दूरदर्शिता से चुना था। दरअसल यही वह समय था,जब यूरोप में रूस के साथ अंग्रेज युद्धरत थे। इस कारण भारत में बड़ी संख्या में सैनिकों को रख पाना संभव नहीं हो रहा था। इस समय भारत में जो अंग्रेजों की फौज थी, उसमें अंग्रेज सैनिकों की संख्या केवल 40 हजार थी, जबकि भारतीय सैनिकों की संख्या 2 लाख 15 हजार थी। जो अंग्रेज 40 हजार की संख्या में थे, वे भी बंगाल, बंबई और मद्रास प्रेसिडेंसियों में बंटे हुए थे। सबसे बड़ी बंगाल की सेना थी, जिसमें सामाजिक दृष्टि से समरूपता थी। इस सेना में अवध, बिहार और उत्तर-प्रदेश के सैनिक थे। इनमें ब्राह्मण, राजपूत, जाट, सिख और मुसलमानों में सैयद व पठान थे। इन सैनिकों की खास बात यह थी कि इन समुदायों में से ज्यादातर ग्रामीण पृष्ठभूमि से थे। इनके अलावा कुछ छोटे सामंत और जमींदारों के पुत्र भी सैनिक थे। इनमें कई सैनिक उन राज्यों से थे, जिन्हें छल-कपट से पराजित करके अंग्रेजों ने अपनी साम्राज्यवादी लिप्सा का शिकार बना लिया था। इसलिए किसी न किसी रूप में आहत ये सैनिक चाहते थे कि 22 जून 1857 को पलासी की पराजय के सौ साल पूरे होने के दिन उत्सव मनाया जाए और इसके पहले अंग्रेजी सत्ता का पतन हो जाए।
यह समय सैनिकों के लिए इसलिए भी अनुकूल था,क्योंकि भारत में जो अंग्रेज सैनिक थे, उन्हें मई-जून की गर्मी सहना मुश्किल होती है। यह वही समय होता है,जब देशभर में रबी की फसल के कटने और उसके क्रय-विक्रय से वसूली जाने वाली लगान से कंपनी का खजाना लबालब रहता है। इसलिए इस मौके की नजाकत को भुनाने की दृष्टि से सैनिकों के नेतृत्वकर्ता दिल्ली के तत्कालीन बादशाह बहादुर शाह जफर और महारानी जीनत महल से भी मिले थे और बादशाह से तात्कालिक संघर्ष की शुरूआत के लिए धन भी मांगा था। किंतु बादशाह ने लाचारी जता दी कि कोष खाली है। वास्तविकता भी यही थी, क्योंकि लगान जागीरदार और मुलाजिमों के जरिए कंपनी के कोष में जमा हो रही थी। झांसी की रानी लक्ष्मीबाई का लालन-पालन नाना की देख-रेख में ही हुआ था, इसलिए झांसी के दुर्ग से जबरदस्ती विस्थापित कर दी रानी भी संग्राम की भावी योजना में शामिल थीं। भारत जैसे विशाल भू-भाग वाले देश में इस तरह से लाखों ग्रामों में क्रांति का आवाहन कर दिया गया और अंगेजों को कानों-कान खबर भी नहीं लगी। कमल और चपाती के प्रतीकों के रूप में क्रांति की अर्थसूचक गोपनीयता तब तक बनी रही थी, जब तक मंगल पाण्डे की बंदूक से गोली नहीं छूटी थी। अंतत: भारत के लोक-मानस में क्रांति के सूत्रधार यह संदेश पहुंचाने में सफल हो गए कि 31 मई 1857 के दिन एक साथ विद्रोह का बिगुल बजाते हुए व यह नारा बुलंद करते हुए कि ‘खल्क खुदा का, मुल्क बादशाह का’ किलों और सामरिक महत्व के भवनों व प्रशासनिक कर्यालयों पर राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया जाए। किंतु भारतीयों के भाग्य में अभी परतंत्रता की बेडिय़ां ही बदी थीं, सो नियत दिनांक 31 मई 1857 को विप्लव की चिंगारी एक साथ नहीं सुलग पाई।
ऐसा अनायास घटी एक छूआछूत की घटना और उससे उपजे वार्तालाप से संभव हुआ। यह घटना कलकत्ता के पास दमदम नाम के छोटे से गांव में घटी थी। बैरकपुर के पास नए ढंग के कारतूस बनाने के लिए 1853 में एक कारखाना खुला था। ये कारतूस खासतौर से एनफील्ड नामक नई बंदूकों में इस्तेमाल के लिए थे। इन कारतूसों को पहले दांतों से काटना पड़ता था, जबकि इसके पहले दिए जाने वाले कारतूसों का मुख का ढक्कन हाथ से खुल जाता था। शुरूआती दौर में ये कारतूस एक-दो सैनिक टुकडिय़ों को ही बांटे गए थे, उनमें से एक बैरकपुर फौज थी। हुआ यूं कि बैरकपुर के पास दमदम का एक ब्राह्मण सैनिक पानी का भरा लोटा लिए छावनी की ओर जा रहा था। यकायक एक मेहतर ने निकट आकर प्यास बुझाने के लिए लोटा मांग लिया। सिपाही चूंकि ब्राह्मण था, इसलिए एक हद तक रूढि़वादी था। छुआछूत की भावना के चलते सैनिक ने लोटा देने से इनकार कर दिया। तब मेहतर ने सिपाही का उपहास उड़ाते हुए कहा, ‘अब जात-पात का घमंड छोड़ो ? क्या तुम्हें मालूम नहीं कि तुम्हें दांतों से काटने वाले जो कारतूस दिए जा रहे हैं, उनमें गाय का मांस और सुअर की चर्बी मिली हुई है। जो नए कारतूस बनाए गए हैं, उनमें जान-बूूझकर मांस और चर्बी मिलाए गए हैं, जिससे हिंदू और मुस्लिम दोनों का ही धर्म भ्रष्ट हो जाए ?’ इस जानकारी से आगबाबूला हुआ सिपाही छावनी में लौट आया। उसने अन्य फौजियों को यह वाकया सुनाया तो उनकी आंखों में गुस्से के लाल डोरे तैरने लगे। फलस्वरूप 10 मई 1857 को मेरठ में इन सिपाहियों ने अंग्रेजी सत्ता के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का शंखनाद कर दिया। इसे ही 1867 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा गया है।
प्रमोद भार्गव

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