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सद्, चिद्, आनंद

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हजार बार सुन चुका, पढ़ चुका कि भारतीय संस्कृति के मूल आधार सत्यम-शिवम-सुंदरम हैं। यह बात ऐतिहासिक रूप से तो गलत है ही, क्योंकि यह 19वीं सदी की पश्चिमी अवधारणा का अनुवाद है। भारतीय सांस्कृतिक परंपरा में यह त्रिपुटी कहीं नहीं मिलती। यह बात तत्वत: भी बहुत भ्रामक है। भारतीय परंपरा में सद्, चिद् और आनंद की बात आती है; अस्ति, भाति और प्रियं की बात आती है। सत्य, दान, दया और तप की बात आती है। सत्य समेत पंचशीलों की बात आती है। सत्य, अहिंसा और अपरिग्रह की बात आती है। पर सत्यम-शिवम-सुंदरम नाम की अजूबी वस्तु कहीं नहीं मिलती। मैंने सत्यानुसंधित्सा या सत्य के लिए अन्वेषण की आकुलता की बात पहले कही, उसीसे अपने आप दो बातें उद्भूत होती हैं-एक, बौद्धिकता का आग्रह ‘नहीं ज्ञानेन सदृशं विद्यते’, ज्ञान की तरह पवित्र वस्तु इस मानव लोक में नहीं है। यह ध्यान देने योग्य है कि इस ज्ञान का अर्थ यह नहीं है कि ज्ञानी कहलाने के लिए आत्म परीक्षण के नाम पर अपनी संस्कृति की कमजोरी पहचानते रहें और कोसते रहे कि मैं भारतीय कहलाने में लज्जा का अनुभव करता हूं। ज्ञान का अर्थ यह भी नहीं है कि दूसरों ने जो खूबियां बतलाई उनके प्रतिबिंबित ज्ञान को अपना ज्ञान मान लें। ज्ञान में ज्ञाता समाहित होता है। वह पूरे प्रणिपात (अपनी पूर्ववर्ती परंपरा के प्रति विनम्र भाव), परिप्रश्न (प्रश्न के बारे में प्रश्न) और सेवा से आता है। भारतीय संस्कृति में तर्क परिशुद्धता पर निरंतर बल रहा है। ज्ञान संपत्ति नहीं है। वह आत्म अतिक्रमण है। ज्ञान के यज्ञ में ज्ञानी स्वयं समिधा बनता है, तभी वही यज्ञ पूरा होता है। सत्य से दूसरी चीज निकलती है वह है साफल्य, संपूर्णता का भाव, आप्यायित होने का भाव, रस निर्भर होने का भाव। कुछ संस्कृतियां हैं जो आशा पर जीती हैं, आशा दिलाती हैं- तुम्हें स्वर्ग मिलेगा, पाप से मुक्ति मिलेगी, ईश का अनुग्रह मिलेगा। भारतीय संस्कृति ऐसी आशा नहीं दिलाती। वह आमंत्रित करती है-चलो संपूर्णता की ओर, सर्वमयता की ओर, खाली होकर भरने की ओर, रिक्त से अतिरिक्त की ओर, व्यक्त से अभिव्यक्त की ओर। -विद्यानिवास मिश्र

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