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संस्कृत के प्रकांड विद्वान डॉ. रेवाप्रसाद द्विवेदी का निधन

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रवीन्द्र शुक्ला
संस्कृत के प्रकांड विद्वान महामहोपाध्याय रेवाप्रसाद द्विवेदी का बनारस में शनिवार 22 मई को 86 वर्ष की आयु में देहावसान हो गया। वे मूलत: मध्यप्रदेश के थे। उनका जन्म सीहोर जिले के बुधनी के पास नांदनेर गांव में 22 अगस्त 1935 को हुआ था। बचपन में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया था। उनका आरंभिक जीवन बेहद संघर्षपूर्ण रहा। उन्होंने बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय से एमए किया और अपना प्राध्यापकीय जीवन इंदौर के शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय से शुरू किया था। रविशंकर विवि रायपुर से पीएच डी और जबलपुर विवि से डी लिट् की उपाधियाँ पाईं। 1969 में वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्यापन हेतु गए और 1995 में सेवानिवृत्त हुए । ये बातें स्वयं उन्होंने मुझे करीब दो वर्ष पहले बताईं थीं जब मैं इंदौर से बनारस गया था और वहॉ महामना पुरी (करौंदी) स्थित उनके निवास पर उनसे मिला था। उनके बड़े पुस्तकालय-सह -अध्ययन कक्ष में उनसे मेरी करीब ढाई घंटे की वह भेंट अविस्मरणीय है जिसमें उन्होंने अपने संस्मरणों का मानो खजाना ही खोल दिया था। तब उनके पुत्र संस्कृत के प्रोफेसर सदाशिव द्विवेदी तथा मेरे छोटे भाई मदन शुक्ला भी मेरे साथ थे। हमने उस वार्तालाप के कुछ हिस्से रिकार्ड भी किए, जो अभी मेरे पास हैं। उन्होंने बताया था कि वह संस्कृत को राष्ट्रभाषा घोषित कराने के पक्षधर रहे और इस हेतु उन्होंने तब के अनेक शीर्षस्थ नेताओं से संपर्क और पत्राचार किया। वे मानते थे कि देश मे सबसे अच्छी हिन्दी मध्यप्रदेश के लोगों की है।
वह बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के संस्कृत, प्राच्य विद्या और धर्म विज्ञान संकाय के संकायाध्यक्ष और बाद में संस्कृत के प्रोफेसर एमिरिटस रहे। उन्हें अनेक शीर्षस्थ राष्ट्रीय सम्मान मिले। राष्ट्रपति नीलम संजीव ने 1979 में उन्हें संस्कृत के सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान से सम्मानित किया था। तब उनकी आयु सिर्फ 45 वर्ष की थी। इतनी कम उम्र में यह सम्मान पाने वाले वह पहले विद्वान थे। उन्हें एशियाटिक सोसायटी मुंबई ने 1983 में महामहोपाध्याय पी वी काणे स्वर्ण पदक प्रदान किया था। 1991 में उन्हें साहित्य अकादमी नई दिल्ली द्वारा सम्मानित किया गया। उन्होंने बनारस में 1980 के दशक में विश्व संस्कृत सम्मेलन आयोजित कराया और कई देशों में विश्व संस्कृत सम्मेलनों में भागीदारी की। उन्होंने 13000 श्लोकों वाले तीन संस्कृत महाकाव्य, पांच किताबें और दो नाटक लिखे। वर्ष 2014 -15 में उन्होंने नरेन्द्र मोदी के चायवाले से प्रधानमंत्री बनने की कथा संस्कृत श्लोकों मे एक पुस्तक में लिखी। मैं जब उनसे मिला तो उसकी एक प्रति उन्होंने मुझे भेंट की। उन्होंने अपने निवास पर ही कालिदास अकादमी की स्थापना की थी जिसके माध्यम से वह शोधार्थी अध्येताओं को मार्गदर्शन देते थे। ऐसे महामना से मिलने का सुयोग पाकर मैंने अपनी बनारस यात्रा को परिपूर्ण माना और आज उनकी यादें तरोताजा हो आईं।
काशी के विद्वानों का कहना है कि पंडित द्विवेदी के निधन से पांडित्य परंपरा का एक कड़ी टूट गई। वहीं पंडित रेवा प्रसाद द्विवेदी के निधन पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी शोक व्यक्त किया है। उन्होंने ट्वीट किया संस्कृत की महान विभूति महामहोपाध्याय पं. रेवाप्रसाद द्विवेदी के निधन से अत्यंत दुख पहुंचा है। उन्होंने साहित्य और शिक्षा के क्षेत्र में कई प्रतिमान गढ़े। उनका जाना समाज के लिए अपूरणीय क्षति है। (लेखक इंदौर में स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

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