Home लेख संकट काल के लिए एक क्रांतिकारी कदम की जरूरत

संकट काल के लिए एक क्रांतिकारी कदम की जरूरत

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आलोक मेहता

कोरोना महामारी का संकट हो या उग्र हिंसा प्रभावित क्षेत्रों का संकट, किसी थोपे गए युद्ध का संकट अथवा कुम्भ जैसे करोड़ों लोगों की सुरक्षा का प्रबन्घ क्या केवल सरकार पर निर्भर रहना पर्याप्त है? शायद नहीं, तभी सामाजिक, स्वयंसेवी, धार्मिक संगठन और कई निजी संस्थान के लोग यथासंभव सहयोग करते हैं। लेकिन हर संकट के लिए भारतीय समाज को तैयार रखने के लिए स्थाई व्यवस्था पर भी विचार होना चाहिये। सुझाव, सिफारिश के हजारों पत्र या फाइलें भी सरकारी दफ्तरों में पड़ी होंगी। फिर भी संकट के इस दौर में अपने स्कूल कॉलेज के दिनों के अनुभव याद करते हुए क्या एक ही क्रन्तिकारी निर्णय से आने वाले वर्षों में संपूर्ण समाज को एक हद तक राहत देने का रास्ता बन सकता है? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी यदि नोटबंदी या जम्मू कश्मीर के लिए पुराने अनुच्छेद 370 को एक झटके में समाप्त करने का फैसला कर सकते हैं, तो सामाजिक शैक्षणिक क्रांति के लिए एक निर्णय करके संसद से भी स्वीकृति क्यों नहीं ले सकते हैं।
सरकार ने शिक्षा नीति पहले ही घोषित कर दी है और उसे लागू किए जाने की तैयारियां केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा की जा रही हंैं। केंद्रीय शिक्षा मंत्री रमेश पोखरियाल निशंक को न केवल विभिन्न राज्यों से बल्कि अंतरराष्ट्रीय संगठनों से सकारात्मक समर्थन मिल रहा है। लेकिन शैक्षणिक व्यवस्था में संघीय संवैधानिक व्यवस्था के बावजूद एक निर्णय सबके लिए अनिवार्यता से लागू करने की आवश्यकता है। यह है -देश के हर सरकारी या निजी क्षेत्र के स्कूलों कॉलजों में हर छात्र के लिए नेशनल केडेट कोर (एनसीसी) के कम से कम एक वर्ष के प्रशिक्षण और उसमें उत्तीर्ण होने की अनिवार्यता। वैसे जो छात्र इच्छुक हों, वे दो-तीन वर्ष का प्रशिक्षण भी ले सकते हैं। उन्हें भविष्य में नौकरियों में इसे शिक्षा की डिग्री के साथ अतिरिक्त योग्यता भी माना जा सकता है।
इस कदम के लिए कोई नया ढांचा भी नहीं तैयार करना होगा। इसमें कोई राजनीतिक विवाद भी खड़ा नहीं हो सकता है। कोई धर्म, जाति, क्षेत्र का मुद्दा नहीं हो सकता है। लड़का -लड़की का भेदभाव भी नहीं है। देश में स्कूल से ही सद्भाव, अनुशासन, सेवा, प्रारम्भिक अद्र्धसैन्य प्रशिक्षण दिए जाने पर किस परिवार को आपत्ति हो सकती है? हां, अनिवार्यता को लेकर कुछ लोग निजी स्वतंत्रता के मुद्दे को अवश्य उठा सकते हैं। लेकिन डेढ़ सौ करोड़ के देश में प्रत्येक को संतुष्ट – प्रसन्न तो कोई नहीं कर सकता है। एक महत्वूर्ण तथ्य यह भी है कि विश्व के कई देशों में 18 से 21 वर्ष तक की आयु और शैक्षणिक डिग्री के लिए एक वर्ष के सैन्य प्रशिक्षण की अनिवार्यता है। इनमें जर्मनी जैसा संपन्न देश भी शामिल है। यह मुद्दा इस समय उठाने का एक कारण और भी है। कोरोना काल में सहायता के लिए राजनीतिक दलों और उनके युवा संगठनों ने कुछ काम भी किया, लेकिन दावे बड़े-बड़े किए,। प्रिंट और डिजिटल प्रचार भी जारी है। फिर भी लाखों सामान्य गरीब लोगों और दूरदराज इलाकों में लोगों को बहुत कठिनाइयां होती रही हैं।। इससे भी बड़ी समस्या गली मोहल्लों में बच्चों – युवाओं के जमावड़ों, उनकी बैचेनी, सामान्य दिनों में भी युवाओं के असंतोष और उग्रता, भटकाव, अपराधियों अथवा अतिवादियों द्वारा उन्हें फंसाने की स्थितियां देखने को मिलती रही हंै।
जहाँ तक राजनीतिक दलों की बात है, उनके अपने पूर्वाग्रह अथवा कमजोरियां हैं। भाजपा बीस करोड़ सदस्यों का दावा करती है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ लगभग पचास हजार दैनिक शाखाओं का दावा।। उनका लक्ष्य ही युवा पीढ़ी में राष्ट्र प्रेम, अनुशासन और सेवा की भावना जाग्रत करना है। सबसे पुरानी कांग्रेस पार्टी भी पांच सात करोड़ सदस्यों का दावा करती है और उसके सेवा दल, युवक कांग्रेस के संगठन है।ं । कम्युनिस्ट पार्टियों का अपना अनुशासित काडर और युवा संगठन हैं।। भाजपा और कांग्रेस को भी कम्युनिस्ट विचारधारा या उनके विदेशी संबंधों-सम्पर्कों पर आपत्तियां रही हैं। समाजवादी पार्टियों के पास भी समर्पित कार्यकर्ता, समर्थक और युवा संगठन रहे हैं। इस तरह नई पीढ़ी को समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों के लिए कोई एक संगठन एक दिशा स्पष्ट नहीं है।
अब असली बात एनसीसी की। यह आजादी के पहले विश्व युद्ध के समय यूनिवर्सिटी कोर की तरह स्थापित हुआ। लेकिन स्वतंत्रता के बाद 1950 से स्कूलों और कॉलेजों में सक्रिय सरकारी प्रशिक्षण व्यवस्था है।। इस समय करीब 17 हजार स्कूल कॉलेज के करीब तेरह लाख युवा (छात्र छात्राएं ) इससे जुड़े हैं। हाल ही में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने बताया है कि 2023 तक सीमावर्ती क्षेत्रों की शिक्षा संस्थाओं में विस्तार करने से करीब पंद्रह लाख युवा इससे जुड़ जायेंगे। जरा ध्यान दीजिये, हमारे देश की आबादी का लगभग पचास प्रतिशत यानी 60 करोड़ युवा हों, वहां सिर्फ 15 लाख के लिए देश की प्रारंभिक अद्र्ध सैन्य प्रशिक्षण व्यवस्था है। इस संगठन में थल, वायु और नौसेना के लिए उपयोगी प्रशिक्षण की सुविधा छात्र की रुचि के अनुसार मिल सकती है।
कुछ वर्ष पहले संसद में सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री ने यह उत्तर दिया था कि एन सी सी संगठन द्वारा चार करोड़ युवाओं के लिए साधन सुविधा उपलब्ध नहीं कराए जा सकते हैं। सबसे दिलचस्प बात यह है कि केंद्र में यह रक्षा मंत्रालय के अधीन है और उससे ही बजट का प्रावधान होता है, क्योंकि केडेट्स को प्रशिक्षण देने की जिम्मेदारी पूर्व सैनिक या सेनाधिकारी को दी जाती है। फिर राज्य सरकारों के शिक्षा विभाग अपने स्कूल कालेज की व्यवस्था खर्च की जिम्मेदारी संभालते हैं । एक और दिलचस्प तथ्य – एन सी सी से ही मिलता जुलता एक सरकारी संगठन है -राष्ट्रीय सेवा योजना (एनएसएस)। यह भी देश के कई कालेजों में समाज सेवा के प्रशिक्षण का काम करता है। योजनाएं और उद्देश्य बहुत अच्छे हैं । लेकिन अनुभवहै कि एनसीसी या एनएसएस सरकारी स्कूलों और कॉलजों में अधिक सक्रिय हैं। निजी यानी पब्लिक स्कूलों कालेजों में अनुशासन, सेवा और जरुरत पडऩे पर सुरक्षा व्यवस्था में अन्य करोड़ों युवाओं को तैयार करने की क्या कोई आवश्यकता नहीं हैं? फिर संसद या अन्य सार्वजनिक मंचों और मीडिया में नई पीढ़ी के भटकने का दु:ख व्यक्त किया जाता है। दिशाहीनता से मुक्ति पाकर नई पीढ़ी के लिए सेवा अनुशासन की शिक्षा दीक्षा की सामान व्यवस्था की अनिवार्यता का केवल एक क्रान्तिकारी निर्णय क्यों नहीं लागू किया जा सकता है ?
(लेखक पद्मश्री से सम्मानित वरिष्ठ पत्रकार हैं। )

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