Home लेख रोग प्रतिरोध ही कोरोना से बचाव की सही उपाय

रोग प्रतिरोध ही कोरोना से बचाव की सही उपाय

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  • विनोद कुमार गुप्ता

42 लाख मौतों के बाद भी पूरे विश्व में कोरोना से बचाव और उसके उपचार पर वही बातें डेढ़ साल से दोहराई जा रही हैं कि मास्क लगा लो, सामाजिक दूरी बना लो, वैक्सीन लगवा लो। इस बात का कोई अध्ययन नहीं हुआ कि यह सब करके हमने क्या खोया, क्या पाया। पहले बचाव की बात करें तो जिन लोगों ने सबसे अधिक मास्क लगाए, भीड भाड़ से बचे रहे और वैक्सीन भी लगवाई, उन लोगों और उनके परिवारों में कोरोना का संक्रमण कम नहीं हुआ।

दूसरी ओर यदि भारत में ही देखें तो जो निर्धन जनसामान्य है, उनमें यह रोग न के बराबर आया और वे लोग तो इस कोविड के अनुरूप बताये गये व्यवहार का पालन भी ठीक से नहीं कर रहे थे और न ही अपनी आर्थिक स्थिति के कारण कर सकते थे, इससे अधिक प्रभावित नहीं हुए। जब पूरा विज्ञान यह मानता है कि जिन लोगों की इम्युनिटी अर्थात रोग प्रतिरोधी क्षमता सशक्त होगी वह इस रोग से पीडि़त नहीं होंगे तो मेडिकल जगत की ओर से इम्युूनिटी बढ़ाने पर कोई गाइडलाइंस क्यों नहीं आईं? क्यों इस पर कोई अध्ययन या चर्चा नहीं होती कि किस प्रकार से जनता अपनी जीवन शैली बनाये कि शरीर की रोग प्रतिरोधी क्षमता सशक्त हो, जो इस महामारी से बचाव कर सके।

बड़ा सरल है मास्क की हिदायत देना। पर कठिन है वैज्ञानिक आधार बताना। जो कोरोना वायरस आज तक किसी माइक्रोस्कोप में दिखाई नहीं दिया उसे मास्क कैसे रोकेगा, जिसके छिद्र और चारों ओर से वायु के प्रवेश का मार्ग वायरस के आकार से कई गुणा बड़ा है। और दूसरी ओर आठ, दस, बारह घंटे या और अधिक समय तक मास्क लगाने से शरीर पर और शरीर की इम्युनिटी पर क्या प्रभाव हो रहा है इसका कोई अध्ययन सामने नहीं आया। एक तो पहले ही अनेक कारणों से हमारी वायु अत्यधिक दूषित है, ऊपर से इतना अधिक समय तक खुली हवा में सांस न लेकर शरीर को जो हानि हो रही होगी, उसका अध्ययन होना चाहिए।
कोरोना हवा में फैल गया है।

इसका कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है पर इस बात से जनसामान्य के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव हुआ । हवा में फैले कोरोना के डर के कारण जो लोगों ने घरों के खिड़की दरवाजे बंद कर लिये क्या वह उनका स्वास्थ्य और अधिक खराब नहीं कर रहा? और जो लोगों की सैर बन्द करा दी, पार्क और खेल परिसर बन्द करा दिये, बच्चों तक का दौडऩा-भागना बन्द है। कोरोना के उपचार में तो जो अज्ञान का अंधेरा दिखता है वह अविश्वसनीय है। यह कैसे संभव है कि पूरे विश्व का मेडिकल सिस्टम अपनी ही विज्ञान के पूर्णत: विपरीत कार्य करे? सारे वैज्ञानिक साक्ष्य, सारा साहित्य और यहां तक की एम बी बी एस की पाठ्यपुस्तक भी यही कहती है कि वायरस संक्रमण में बुखार उतारने की दवाओं का प्रयोग बीमारी की अवधि को भी बढ़ायेगा और मौतें भी बढ़ेंगी। पर कई डाक्टर यह सुनने-मानने को तैयार नहीं है, कहते हैं वैज्ञानिक शोध की चिकित्सा तंत्र मात्र सौ वर्ष पुराना हो और पिछले पचास वर्षों से आ रही रिसर्च को न देखना चाहें तो यह मानव जाति के साथ कितना बड़ा अपराध है।

ऐसा लगता है कि समस्या का मूल वही है जो हमारी एलोपैथिक साइंस ने यह मान लिया कि जर्म को मार कर ही हम रोग को समाप्त कर सकते हैं, वह यह भूल गए कि यदि शरीर सशक्त होगा तो रोग अथवा रोगाणु शरीर को रोगी नहीं कर पाएंगे। वास्तव में तो जर्म को मारने के चक्कर में वे अनेक प्रायोगिक और परीक्षण के दौर से गुजर रहीं दवाएं खिला शरीर को ही मारते रहे। हमें समझना होगा कि यदि मार्ग में वायरस रूपी लाखों कंकर बिखरे हैं तो एक एक को चुन कर दूर करने से अच्छा ह ै कि आप चप्पल, जूता पहन लो, बचाव कर लो अर्थात् शरीर को सशक्त कर लो। ऋतु और काल के अनुरूप हल्का भोजन करें, पेट साफ रखें, सैर, व्यायाम, योगासन, प्राणायाम करें और अच्छी नींद लें, नियमित जीवन जियें।
(लेखक सामयिक मामलों के विश्लेषक हैं।)

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