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मन मस्त फकीरी धारी है का जीता जागता उदाहरण थे हमारे डॉक्टर राजकुमार जी

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जिस श्रद्धा भक्ति और आस्था के साथ हम कहते हैं कि अविरल गंगा निर्मल गंगा भागीरथ के समय से ही गंगा प्रवाहित हुई अविरल वनी रही कहीं कोई व्यवधान नहीं कहीं कोई परिवर्तन नहीं जैसी श्रद्धा भक्ति आस्था उस जल के प्रति उसका निर्मल मन आ सेतू हिमालय तक संपूर्ण हिंदू समाज को पवित्र कर मनुष्य जीवन के उद्देश की पूर्ति में सार्थकता प्रदान करती है वैसा ही यदि मनुष्य के रूप में निकट से किसी को देखने का अवसर मिला तो वह राजकुमार जी थे पिछले 25 वर्षों से मैं एक जैसा ही देख रहा था उनको विभाग प्रचारक थे प्रांत के दायित्व का निर्वहन कर रहे थे प्रांत के प्रचारक प्रमुख के रूप में भी वही व्यवहार एक छोटे कार्यकर्ता एक नए व्यक्ति या कोई बड़ा अधिकारी सबके साथ समान व्यवहार हमेशा उनका मन मस्त फकीरी में ही रहता था कवि ढपली पर कभी बांसुरी पर कवि बैंजो पर कभी चुटकी पर कवि जीव और गालों की आवाज पर ‘जाहि विधि राखे राम ताहि विधि रहिए’ उनका जीवन संगीत में था इसीलिए तो उनका हर क्षण रोम रोम से संगीत झड़ता था यही तो उनकी खुशी का उनकी फकीरी का राज था उन्होंने अपने जीवन को संगीत बना लिया था वह अपने जीवन को वास्तविक रूप में जी रहे थे वह कहते थे “हार गए तो मत घबराना जीत गए तो मत इतराना” कहते नहीं थे उनका जीवन का आचरण था जीवन का दृश्य था उन्होंने कभी भी अपने को बड़ा नहीं माना कितना छोटा कितना छोटा स्वयंसेवकों में भी सबसे छोटा स्वयंसेवक हूं ऐसा भाव था उनका तभी तो पूरे देश भर से निकलने वाली ट्रेन उन ट्रेनों में प्रवास करने वाले अखिल भारतीय अधिकारी या अन्य किसी की भी कोई सूचना आई ट्रेन पर भोजन अल्पाहार चाय व्यवस्था तो करते ही थे पर स्वयं भी उपस्थित होते थे। अखिल भारतीय क्षेत्रीय अधिकारी तो छोडि़ए उनके जैसा प्रेम मैं वर्णन नहीं कर सकता कभी-कभी जब मैं विश्व हिंदू परिषद में था और प्रवास पर ट्रेन से इटारसी होते निकल रहा हूं और मैंने कह दिया कि भाई साहब कहां हैं भाई साहब चाय पीने की इच्छा है अद्भुत अद्भुत भाई साहब चाय लेकर के स्टेशन पर खड़े हुए है ,चाहते तो वह किसी कार्यकर्ता को चाय लेकर भेज सकते थे , पर यही तो प्रेम है
प्रेम। हर कार्यकर्ता के घर के पारिवारिक सदस्य थे जिस परिवार में पहुंच जाते थे उस परिवार के तो ताऊ जी अंकल जी बन जाते थे जिस परिवार में जाते कुटुंब की संकल्पना साकार हो जाती थी
नया सीखने का भाव तो इतना रहता था की पॉकेट डायरी पैन कोई भी नई चीज बात सुनने में देखने में पढऩे में आई तुरंत नोट कर लेते थे जब संगीत की रुचि जागी तो ढपली सीखी बांसुरी सीखें कई दिनों तक हम जैसे कई लोगों ने उनके ढपली पर भजन गीत सुने होंगे बांसुरी तो उनकी आखरी समय तक रोज का हिस्सा बन गई थी, कितने ही प्रकार की ध्यान पद्धतियां चिकित्सा पद्धतियां का उन्होंने प्रशिक्षण लिया और लोगों को उसका लाभ दिया उसका हम सबको अनुभव है ही संघ शिक्षा वर्ग में या बड़ी बैठकों में आनंदम परमानंदम योग, प्राणायाम सीखा, अभी लॉकडाउन में तो वैसे अंग्रेजी उनको आती थी पर और अधिक सीखने के लिए मोबाइल अंतरताने पर विश्व के कई देशों के लोगों के साथ अंग्रेजी में बात करना सीखना। लंबे समय तक इटारसी संघ कार्यालय मुख्यालय होने के कारण अनेक विभाग प्रचारको को उनका सानिध्य प्राप्त हुआ उनका मार्गदर्शन प्रत्येक विभाग प्रचारक को नए पुराने अनुभवों के साथ मिला मेरी जब उनसे बात होती थी तो वह प्रचारकों की विशेषताओं योग्यताओं की चर्चा करते थे।
ब्रज किशोर भार्गव

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