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भारत के अमृतकुंड को सुखाने का षड़यंत्र

  • जगदीश गुप्त ‘महामना’
    भारत की परिवार व्यवस्था पर हमलों का क्रम निरंतर चल रहा है। पहले स्त्रियों को लूटा गया बेचा गया। फिर सती शब्द को कलंकित किया गया ताकि स्त्रियां अपना समर्पण त्याग दें। स्त्री विमर्श के नाम पति पत्नी के स्त्री-पुरुष की ईश प्रदत्त विशेषता को ही संघर्ष का माध्यम बना कर उन्होने लाखों परिवार तुड़वा भी दिए पर वे विफल ही रहे। गृह स्वामिनी को वेतन के नाम उकसाने के प्रयास विफल हुए। सम्पत्ति में समानता का अधिकार बता कर भाई बहन में द्वेष रोपा गया है और लाखों ग्रामीण परिवार अपनी सम्पत्तियां बेच कर या तो मजदूरी कर रहे हैं या भीख मांग रहे हैं। परिवार का दायित्वबोध समाप्त करने वाले लिवइन जैसे भारतीयता बिरोधी कानून को मांन्यता दिला दी गई है । परस्त्री परपुरुष से विवाहेतर संबधों को अपराध की श्रेणी से हटाकर परिवार में निष्ठा का मूल्य समाप्त कर दिया गया है । उसकी पवित्रता समाप्त होने से परिवार एक दिखावा मात्र है । शेष तो वह व्याभिचार का अड्डा ही रह जाता है।
    कई स्त्रियां/ पुरुष इस आड़ में अपने जीवनसाथी (पति/पत्नी) की दुर्बलताएं गिनाकर अपने अन्य साथियों से धन व सुविधाए ले रहे है। ऐसे में इस कानून ने उन्हे वेश्या ही बना दिया है । बस उन्हें वैश्या कहा नहीं जा सकता। अब कुछ वर्षों से विवाह संस्था में समलैंगिक विवाह के नाम पर विकृति के लिए प्रयास जारी हैं अप्राकृतिक होने पर भी समलैंगिकता के विवाह को कानूनी मान्यता दिलाई जा रही है। बताया गया है कि अब बच्चों में यौन स्वच्छंदता के अधिकार के नाम पर ब्रम्हचर्य और ज्ञानार्जन से दूर करने का षड्यंत्र किया जा रहा है। दुर्भाग्य का विषय यह है कि बताया जा रहा है कि यह कार्य करने के लिए संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्था अपने सदस्य देशों को निर्देश जारी कर रही है। और भारत की सर्वोच्च न्याय व्यवस्था पता नहीं क्यों? बड़ी उतावली में है कि वह इस पर शीघ्रतिशीघ्र कानून बनवा सके। ऐसे विषयों को लेकर सुनवाई भी चल रही है । भारतीय समाज व्यवस्था में चार आश्रमों का प्रावधान है। जिसमें ब्रह्मचर्य की वह ज्ञान और देह पुष्टि के लिए है शेष जीवन के सुख में होने की गारंटी हो जाए। अब षड़यंत्र किया जा रहा है कि बच्चों को यौन सुख आधिकार के नाम पर, ब्रह्मचर्य के स्थान पर बचपन में ही यौन जनित बीमारियां दुर्बलता और चिड़चिड़ापन जीवन भर के लिए दे दिया जाए ताकि ज्ञान अर्जन से दूर ऐसे युवा आपसी क्लेश और कलह् से देश को दुर्बल कर दें।
    ताकि आजादी के महज 75 वर्षों के भीतर ही भारत के विश्व पर वर्चस्व के नए दौर की बढ़त को आरंभ में ही रोक दिया जाए। जैसे पंजाब बर्बाद हो गया वैसे बाकी भारत भी नष्ट हो जाए। धनजन बुद्धि बल उन्हें 19 47 से पहले की तरह लूट कर ले जाया जा सके और उससे यूरोपीय देश अरब देश अय्याशियां कर सकें। भारतीय समाज के स्वर्ण काल की जो कहानियां सुनते आए हैं उनके पीछे भारत की परिवार व्यवस्था ही मूलाधार थी। भारत की परिवार व्यवस्था में विभिन्न लैंगिक शारीरिक मानसिक क्षमताओं में अंतर होने के बाद भी उसे इस तरह बुना गया, गढ़ा गया कि प्रेम समरसता व सम्मान सबको मिलता रहे। अपनी आयु व क्षमता के अनुसार काम करने का उल्लास सदा बना रहे। एक दूसरे के प्रति आदर व कर्तव्य वह सुनिश्चित रहे और यह करते हुए किसी को भी कोई हीन भावना का बोध न हो। संसार की इस अद्भुत पूरी परिवार व्यवस्था की धुरी है पति पत्नी का संबंध। क्या अद्भुत है कि यहां किसी को कोई अधिकार नहीं है। सबके पास मात्र कर्तव्य है त्याग हैं निष्ठा समर्पण है। इस अधिकार विहीनता के उपरांत भी, सुरक्षा और संपन्नता का एक विशाल साम्राज्य हजारों क्यों खड़ा रहा। जिससे भारत विश्व के आर्थिक व्यापारिक गुरुत्वाकर्षण का केंद्र बन गया।
    किसी ने उसे सोनचिरैया कहा तो किसी ने विश्व गुरु कहा। इसकी कहानियां सुनकर कई ग्राहक संसार भर से यहां आए। यहां आकर ही वे लुटेरे बन गए । इसे लूटते रहे ,लूटते रहे। कुछ तो यहीं आकर बस गए और कुछ ही वर्षों में मिट ग्ए । इन्हीं लुटेरो ने भारत के अमृत कुंड को ढूंढा और पाया कि यह परिवारों ही है जिसे मिटाए बिना भारत ना मिटेगा । इसका अक्षय पात्र कभी न रीतेगा। वे लगे हैं हमारा अमृत कुंड सुखाने में हमारे परिवार को मिटाने के लिए नए-नए षड्यंत्र बनाने, रचने रचाने में। लेकिन यह हमारा दायित्व है कि हम अपने को बचाएं। हम अपने को ,अपनी पीढ़ियों को ,अपने वैभव को, अपनी सुरक्षा को, अपने सम्मान को, तब ही बचा पाएंगे, जब हम अपने परिवार को बचा पाए ।

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