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भाजपा की हार में जीत कब तक देखेगी कांग्रेस

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कांग्रेस के दो प्रवक्ता संजय झा और प्रियंका चतुर्वेदी पिछले दिनों पार्टी से बाहर हो गए। अब अन्य प्रवक्ता रागिनी नायक ने बंगाल की विजय पर ट्वीट कर कहा-यदि हम कांग्रेसी मोदी की हार में ही अपनी खुशी ढूंढ़ते रहेंगे तो अपनी हार का मंथन कब करेंगे। रागिनी ने यह प्रतिक्रिया पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष राहुल गांधी के उस ट्वीट के बाद दी थी जिसमें राहुल ने कहा था कि वह ममता बैनर्जी और बंगाल के लोगों को भाजपा को परास्त करने के लिए बधाई देते हैं। रागिनी की सलाह बहुतेरे कांग्रेसियों का राहुल को परामर्श है। असंतुष्टों के समूह-23 की तो है ही। क्योंकि उन्होंने कांग्रेस की रीति-नीति को आमूल-चूल बदलने की सलाह दी जिसे आलाकमान ने रद्दी की टोकरी में डाल दिया। राहुल गांधी ने बंगाल में अपनी पार्टी को बंगाल से झंडे-डंडे समेटकर वापस लौटने के लिए मजबूर कर दिया। उनके वोट या तो ममता बैनर्जी की तृणमूल कांग्रेस खा गई या भाजपा। 2016 के विधानसभा चुनाव में जीतीं 44 सीटों में से 29 तृणमूल और 15 भाजपा ने छीन लीं। लेकिन कांग्रेस उस पर मंथन नहीं कर रही है। उसने 2019 के लोकसभा चुनाव में लगातार दूसरे संसदीय चुनाव में करारी शिकस्त की भी गंभीर समीक्षा आज तक नहीं की। सो, बंगाल सहित पांच राज्यों में पराजय का पोस्टमार्टम किया जाएगा, इसकी उम्मीद किसी को नहीं है। इसीलिए शायद रागिनी को यह बात कहनी पड़ी। यह राजनीतिक तमाशेबाजी मौन होकर देखने वाले पता नहीं कांग्रेस का क्या भविष्य गढ़ रहे हैं। लोकसभा चुनाव में पार्टी की शर्मनाक पराजय की जिम्मेदारी लेकर इस्तीफा देने वाले राहुल गांधी को दोबारा अध्यक्ष बनाने की मांग की हर छोटी-मोटी सफलता पर की जाती रही है। पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव ने पार्टी को गंभीर विश्लेषण का काफी मसाला दिया है। इस पर मंथन ही उसे 2024 के चुनाव के लिए गंभीरता से तैयार कर सकता है। आने वाले समय में उत्तराखंड और गोवा में चुनाव हैं। इसके बाद पंजाब व उत्तरप्रदेश में विधानसभा चुनाव होंगे, जिसके लिए क्या इन चुनावों से कोई सबक लिया जाएगा, पार्टी के नेता तो इसकी जरूरत की ओर ही इशारा कर रहे हैं। पांच राज्यों में कांग्रेस को पिछले विधानसभा चुनावों में 103 सीटें मिली थीं और भारतीय जनता पार्टी के पास इनमें महज 64 विधायक थे। हाल के चुनाव में कांग्रेस के पास मात्र 80 विधायक रह गए यानी उसने 23 सीटें खो दीं तो भाजपा ने 147 सीटें हासिल कीं अर्थात 73 का इजाफा किया। कांग्रेस ने केवल तमिलनाडु में ही सीटें बढ़ाईं। इसका कारण उसका जीतने वाले मोर्चे का घटक होना था। अन्यथा अन्य राज्यों में उसकी बुरी गत बनी है। केरल जहां से राहुल गांधी सांसद हैं, में पार्टी को इतिहास चक्र के हिसाब से सत्ता में लौटना था, पर वह पिछले चुनाव की तुलना में एक सीट और खो बैठी। राहुल गांधी ने इसी राज्य में सबसे ज्यादा समय दिया था। बंगाल चुनाव में तो वे सिर्फ एक बार गए। इसमें जिन दो सीटों पर प्रचार किया, दोनों पर ही कांग्रेस उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई। हालांकि यह उतना महत्वपूर्ण नहीं है, वरन राज्य में 64 वर्ष तक राज्य करने वाले कांग्रेस व वामपंथी दलों का सूपड़ा साफ होकर शून्य पर आ जाना राजनीतिक इतिहास की बड़ी घटना है। इन चुनावों में ममता बैनर्जी की जीत ने कांग्रेस की उस हैसियत को भी कमजोर कर दिया जिसके बलबूते पर वह भाजपा अथवा मोदी सरकार के खिलाफ एक संयुक्त विपक्ष की धुरी बनने की स्वाभाविक दावेदार बनती थी। विपक्ष में ममता ने राहुल को उनसे कमजोर नेता साबित कर दिया। जीतने के बाद पहली ही प्रतिक्रिया में ममता बैनर्जी ने राष्ट्रीय मोर्चा बनाने के विचार को आगे बढ़ाने के संकेत दिए। उन्होंने कहा कि वे एक स्ट्रीट फाइटर यानी सड़क पर लड़ाई लडऩे वाली कार्यकर्ता हैं। क्या राहुल गांधी और सोनिया गांधी ने इसे नोट किया। यद्यपि देश के कई लोग यह मानते हैं कि मोदी से सबसे आक्रामक तरीके से राहुल ही लड़ रहे हैं। कांग्रेस का एक वर्ग इसे लेकर उत्साहित भी नजर आता है। दरबारी तबका इसमें खासतौर से शामिल है। लेकिन बड़ा तबका ढंके-मुंदे तरीके से उन्हें कह रहा है कि ट्वीटर से तीर छोडऩे से कुछ नहीं होगा। मैदानी लड़ाई का खाका खींचना होगा। राहुल गांधी आभासी लड़ाई ज्यादा लड़ रहे हैं। हर सुबह उनका ट्वीट आता है। उस पर बेशक राजनीतिक बहस का आधार बनता है और राहुल लाइमलाइट में रहते हैं लेकिन चुनाव में जब मैदान पर सेनाओं की जंग होती है और गांव-गांव का आम मतदाता अपनी राय जाहिर करता है तो कांग्रेस पिछड़ जाती है। ट्वीटर के तीर मदद कर सकते है, लड़ाई नहीं जीत सकते। विधानसभा चुनाव में केरल में सबसे ज्यादा वक्त बिताते हुए राहुल ने व्यायामों का प्रदर्शन किया या समुद्र में तैराकी की, मतदाता ने इस पर वोट नहीं दिए। खुद उनकी संसदीय सीट की सात विधानसभा सीटों में से कांग्रेस तीन ही जीत सकी। चुनाव में पार्टी का ढांचा चाहिए, कार्यकर्ताओं की मनोबल युक्त फौज की जरूरत होती है, स्पष्ट कार्यक्रम चाहिए और सुस्पष्ट विचारधारा चाहिए। हाल के विधानसभा चुनाव में ये सब गायब थे। बंगाल में पार्टी की कमान संभाल रहे अधीर रंजन चौधरी से परिणाम के बाद पूछा गया कि अब क्या कार्यक्रम है तो उनका उत्तर था-कुछ नहीं (नथिंग)। यही स्थिति राहुल गांधी के परोक्ष या अघोषित नेतृत्व में कांग्रेस की है। एक तरफ वह वैचारिक भ्रम की शिकार है, जिसका ताजा उदाहरण बंगाल में वाम के साथ मिलकर चुनाव लडऩा तो केरल में खिलाफ ताल ठोकना था। देश के हर महत्वपू्र्ण मुद्दे पर उसका यही हाल रहा। इसलिए मोदी सरकार की जो भी कमजोरियां हैं, वही भाजपा को पीछे करती हैं, विपक्ष नहीं। जाहिर है कि बिल्ली के भाग से छींका टूटेगा की प्रतीक्षा कोई बुद्धिमान नेतृत्व नहीं करेगा। चुनाव के अलावा, कांग्रेस पिछले सात साल में अपने कैडर को कोई ठोस, लड़ाकू और स्पष्ट कार्यक्रम नहीं दे सकी। किसान आंदोलन हो या अन्य मुद्दे, वह किसी न किसी के फटे में पांव ही देती रही है। ऐसे में वह मोदी के खिलाफ मजबूत विपक्ष खड़ा करना तो दूर, अपना अस्तित्व तक बचाने के लिए संघर्ष कर रही है। ऐसे में कांग्रेस के प्रवक्ता, नेता और कार्यकर्ताओं के मन में जो उद्वेलन है, उसे सुनने की जरूरत है। देखना है कि कांग्रेस के जिन संगठनात्मक चुनावों को विधानसभा चुनावों के मद्देनजर टाला गया था, क्या वे जून में कराए जाते हैं और उनमें पार्टी को नई ऊर्जा देने का कोई ठोस विकल्प आता है या गांधी परिवार ही जहाज का अंतिम कप्तान बना रहता है। (लेखक स्वदेश के कार्यकारी संपादक हैं। )
शिवकुमार विवेक

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