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बंगाल विधानसभा परिणामों में विचारणीय क्या ?

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पांच राज्यों के चुनाव और उनके परिणामों में बंगाल के परिणामों की सबसे अधिक चर्चा है और मजे की बात यह है कि इन परिणामों ने सभी पक्षों को खुश होने के कारण भी उपलब्ध कराये 7 भाजपा इसे अपनी पराजय मानने के स्थान पर 3 से 77 सीटों पर जीत और पिछले विधानसभा चुनाव से 28.13 प्रतिशत अधिक मत प्रतिशत मिलने पर खुश हो रही है तो विपक्ष ‘अबकी बार 200 पार’, ‘2 मई , ममता गई ’ तथा ‘खेला नहीं, विकास होबे’ के नारों को बेअसर कर चंडी पाठ और व्हील चेयर की रण नीति के सफल होने पर खुशी मना रहे हैं । वाम दल और कॉंग्रेस अपनी बर्बादी के मातम से अधिक भाजपा को बहुमत न मिलने में ही खुशी तलाश रही है। जिन दलों का बंगाल के चुनावों से दूर का नाता भी नही हैं , वे भी खुश होकर ममता दीदी को बधाई दे रहे हैं तो केवल इसलिए कि कोई तो है जो मोदी को टक्कर दे पा रहा है। उमर अब्दुल्ला और शिवसेना के संजय राउत की टिप्पणियाँ क्या इसी श्रेणी में नही आतीं ? खुश होने वालों की श्रेणियां इतनी ही नही हैं। कुछ लोग कहेंगे, बंगाल की अस्मिता को बचाने के लिए ये वोट पड़े तो कुछ इसे व्हील चेयर या अकेली महिला के संघर्ष को मिले वोट कहेंगे। इस चुनाव में मुस्लिम वोट फुरफुरा शरीफ और औवेसी की और न झुककर टीएमसी की और ही झुके , इससे ही खुश होने वाले लोग भी हैं। चुनाव परिणाम आने के बाद भाजपा कार्यालयों और कार्यकर्ताओं पर हिंसक आक्रमणों से यह कहने वाले भी होंगे कि इन चुनावों की जीत में टीएमसी के गुंडों के भय ने भी काम किय होगा । सवाल यह है कि क्या चुनाव परिणामों के विश्लेषण के उपरोक्त सभी मानदंड एक स्वस्थ और प्रगतिशील लोकतंत्र के लिहाज से विचारणीय है ? यद्यपि विगत कुछ दशकों से चुनावों की व्यवस्था में अनेक बदलाव हुए हैं पर अभी भी मूल मुद्दे जो प्रजातंत्र के साथ –साथ देश को भी मजबूत करने वाले हैं , वे चुनाव परिणामों में परिलक्षित नही हो पा रहे है, और यह मुद्दा ही अब अधिक विचारणीय है। मसलन, एक लम्बे समय तक देश में निष्पक्ष चुनाव कराना ही एक बडी चुनौती थी जिस पर टी. एन. शेषण के कार्यकाल में जो लगाम लगी,वह चुनाव दर चुनाव मजबूत ही हुई। अब सरकारी तंत्र के दुरूपयोग, चुनाव आयोग का केंद्र सरकार के प्रति झुकाव होना , पेरा-मिलेट्री फोर्सेस का दुरूपयोग होने और ई वही एम् मशीन से छेड़छाड़ के आरोप तो लगते हैं पर वे चुनाव में हारने के डर से या हारने के बाद लगते हैं। ममता दीदी भी ये आरोप लगा चुकी है पर यदि यह सच होता तो वे चुनाव क्यों जीतती ?
याद कीजिए, एक लम्बे समय तक जातिवाद चुनावों पर हावी हुआ और समाजवादी पार्टी और बसपा जैसे दल राष्टीय राजनीती पर छाते हुए दिखे पर अब वे भी हाशिये पर हैं। भ्रष्टाचार और लोकपाल के मुद्दे पर पैदा हुई पार्टी अर्थात आप पार्टी अपने पैर दिल्ली में तो जमाकर रख सकी पर इस राष्ट्रीय केंसर के राष्ट्रव्यापी होने के बाद भी आप पार्टी की पकड़ देशव्यापी नहीं हो सकी। कैसी विडम्बना है कि एक समय राष्ट्रीय राजनीती को प्रभावित करने वाले दलों के नेता बंगाल की जीत में इसी बात से खुश हो रहे हैं कि इस जीत से विपक्ष को एक ऐसा चेहरा मिल सकता है जो बिखरे, हताश और लुटे –पिटे विपक्ष का चेहरा बन सके। मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री और कॉंग्रेस के कमलनाथ का दीदी को बधाई के साथ मध्य प्रदेश में आमंत्रण क्या इसी छुपी इच्छा का इजहार नही है ? अब बात उन विचारणीय मुद्दों की जिन पर इन चुनावों के बाद भाजपा सहित सभी राजनैतिक पार्टियों को विचार करना चाहिए। पहली और सबसे बड़ी बात जिसे अधिकांश राजनैतिक पार्टियां नजरन्दाज कर रही हैं वह यह है कि चुनाव-दर चुनाव मतदाता परिपक्व हो रहा है और अब इसे बरगलाना और वह भी पुराने घिसे-पिटे तरीको से न तो संभव है और न ही प्रजातंत्र के हित में है। इस अहम् तथ्य को अनेक पार्टियों ने भूल दिया और वे आज हाशिये पर है पर फिर भी वे इसे मानने को तैयार ही नही है। कांग्रेस और कुछ और दलों के कतिपय नेताओं और घरानों ने तो सदियों से पार्टी और संगठन का ऐसा एकाकार किया जिसमे एक परिवार ही पार्टी बन गया और इसका परिणाम सामने है। आश्चर्य तो यह है कि इन गलतियों से सीखकर वे बदलने को तैयार भी नही है। लिहाजा विपक्ष लगातार कमजोर हो रहा है। इसके विपरीत भजापा में सत्ता और संगठन में न केवल स्पष्ट अंतर है बल्कि उसमें एक प्रजातान्त्रिक प्रक्रिया भी है। भाजपा चुनावों को न केवल एक सोची-समझी रणनीती से लड़ते है बल्कि हार या अपेक्षित जीत न मिलने पर उसका आतंरिक तौर पर तो ई मानदार विश्लेषण करते ही है। आप कह सकते है कि यदि ऐसा था तो 200 का आंकड़ा पार क्यों नही हुआ ? यह सही तर्क है पर शायद आप भूल रहे है कि किसी भी चुनाव के अनेक नारे कार्यकर्ताओं के उत्साह के लिए भी बनाए जाते है और रणनीति उसेकी सफलता के लिए ही बनाई जाती है। इसमे किसी भी स्तर पर कोई भी चूक या गफलत होने पर (जो बाद में ही पता चलती है), परिणामों को प्रभावित अवश्य करती है पर यदि सफलता की कुछ सीढिय़ाँ भी पार हुई तो आगामी सुधार की नीव रखी जाती है। भाजपा का बंगाल में यही हुआ पर विपक्ष में यह बात नही दिखती और वे केवल भाजपा को कोई दूसरा टक्कर दे रहा है, इसी में संतोष कर रहे हैं। भाजपा के चुनाव प्रचार और उसकी सीमित सफलता के कुछ विचरणीय बिंदु और भी हैं जिन पर गौर किया जाना चाहिए। मुझे याद है, प्रचार के दौरान गृह मंत्री अमित शाह ने यह कहा था कि भाजपा एन आर सी लायेगी। क्या राष्ट्र हित में यह गलत घोषणा थी ? तमाम विकसित देशों में एनआर सी लागू है और वह विदेशी घुसपैठिये रोकने के लिए आवश्यक है। बंगाल इसका सबसे अधिक प्रभावित राज्य है। यदि इस घोषणा से और ममता दीदी की तुष्टीकरण की नीती पर भरोसा कर बंगाल के मुस्लिम वोटर ने फुरफुरा शरीफ और असउद्दीन ओवैसी को दरकिनार कर ममता को वोट दिया है तो राजनीती का यह पक्ष कैसे राष्ट्र हित करेगा, यह विहार्नीय है ? इतना ही नही, यह क्रम यदि जारी रहता है, और भाजपा भी अपने अस्तित्व को बचाने राष्ट्र हित के मुद्दों से किनारा करेगी तो फिर देश की राजनीति का कौन सा चित्र उभरेगा, इसक चिंतन आवश्यक है। अब भाजपा के दूसरे नारे ‘खेला नही , विकास होबे’ और ममता की भारी जीत के क्या मायने हैं ? क्या पश्चिम बंगाल का इतना विकास हो गया है कि अब विकास नही , खेला की मुद्दा है ?सत्य यह है कि विगत दो दशकों के ममता और इसके पूर्व वाम मोर्चे के लम्बे कार्यकाल के बाद भी बंगाल एक पिछड़ा राज्य है और फिर भी विकास के स्थान पर खेला वाला नारा जीतता है तो यह विकास की राजनीति ( यदि मानें तो ) को हतोत्साहित करने वाला है और चिंतनीय है। इसका आशय यह नही है कि बंगाल की जनता ने दीदी को जो मत दिया, वह गलत है। निश्चय ही एक मजबूत और संगठित विरोध के बाद भी ममता पर जनता का भरोसा उनकी बड़ी जीत है और यहाँ यदि वे इस मजबूत ताकत और मौके का इस्तेमाल विपक्ष द्वारा गिनाई गई उन कमजोरियों, जिनके चलते भाजपा का 3 से 77 होने का मौका मिला, उसे मोदी विरोध भूलकर दूर करने में लगाएंगी तो वे भी वाम मोर्चे की तरह लम्बी पारी खेल सकती है। इस सन्दर्भ में यदि इस कहावत को ममता याद रखती है कि ‘पॉवर टेंड्स टू करप्ट एंड एब्सोल्यूट पॉवर करप्ट्स एब्सोल्युटली’ तो उनकी यह पारी अधिक प्रभावी होगी और वे सही मायने में एक राष्ट्रीय राजनैतिक सम्पत्ती होंगी। वे याद रखें कि इसमे खतरा वे विपक्षी पार्टियाँ हैं जिनका जनाधार खिसक गया है। ये पार्टियाँ ममता के कंधे पर मोदी विरोध का झंडा टांगेगे और दीदी को उनकी माँ , माटी और मानुष के सूत्र वाक्य से दूर करेंगे। आशा की जानी चाहिए कि इस एतिहसिक जीत के बाद ममता का किला विकास के रास्ते से और भी मजबूत होगा । (लेखक : प्राध्यापक , वाणिज्य विभाग डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर)
प्रो. जी.एल. पुणताम्बेकर

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