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धार्मिक संस्थाओं के सेवा पक्ष के विस्तार की जरूरत

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शिवकुमार विवेक
मंदिर नहीं, अस्पताल बनाओ के शोर के बीच यह खबर मन को तसल्ली देती है कि सिख गुरुद्वारों के प्रबंधन से जुड़ी समितियां बड़े-बड़े अस्पताल बनवा रही हैं। नांदेड़ में एक हजार बिस्तर का सभी सुविधाओं से युक्त चिकित्सालय बनाया जा रहा है तो पटना साहिब गुरुद्वारे और इंदौर में सिख समुदाय द्वारा अस्पताल बनाने की योजना सामने आई है। यह समाज के प्रति धार्मिक समुदाय के कर्तव्य और धर्मस्थलों की सामाजिक भूमिका को रेखांकित करता है। प्राचीन समाज और भारतीय चिंतन में धर्म की इस भूमिका या दायित्व को बहुत गहराई से प्रतिपादित किया गया था। हिंदू धर्म में तो नर सेवा को नारायण सेवा का स्वरूप माना गया था अर्थात मूर्तियों और देवी-देवताओं की पूजन-आराधना के अतिरिक्त व्यक्ति की चिंता और उसकी सेवा को धार्मिक कर्तव्यों में सर्वोपरि स्थान सुनिश्चित किया गया था।
कोविड महामारी के विस्तार व विकरालता को देखते हुए अस्पतालों और चिकित्सा सुविधाओं की जरूरत को गहराई से महसूस किया गया है। इस आपदा ने स्वास्थ्य सेवाओं की क्षुद्रता और तंत्र की अक्षमता को उजागर किया है। स्वास्थ्य सेवाओं की यह बदहाली और अपर्याप्तता रातों-रात दूर नहींं हो सकती। और वह भी तब मर्ज दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा हो। न तत्काल सुविधायुक्त अस्पताल बनाए जा सकते, न दवाओं के निर्माण को बहुगुणित किया जा सकता और न ही ऑक्सीजन बनाने के कारखाने और उनके परिवहन के लिए विशेष टैंकरों की व्यवस्था तत्काल संभव होती है। यह काम समय के साथ होना चाहिए था जिसे हमने पिछले सात दशकों में नहीं किया। इसलिए आज अस्पताल बनाने का प्रश्न उठाना और मांग करना अनुचित नहीं है और समाज, समुदायों और संस्थाओं से इसकी अपेक्षा करना भी गैरवाजिब नहीं है।
मंदिर नहीं बनाएं कहना तो उचित नहीं है। आखिर हम एक आस्तिक समाज में रहते हैं और इस समाज में धर्म को वैयक्तिक आत्मोन्नति के साधन के रूप में देखा गया और जिसका एक सामाजिक प्रयोजन रहा है। हिंदू धर्म में तो मंदिर भी समाज के दैनंदिन जीवन का हिस्सा रहे हैं। वे न केवल समाज के मार्गदर्शन के केंद्र रहे बल्कि उसकी कई गतिविधियों के संचालन के केंद्र रहते थे। प्राचीन काल में जब बैंक नहीं हुआ करते थे, तब वे बैंक की भूमिका भी निभाते रहे हैं। लिहाजा सामुदायिक जरूरत व धार्मिक विश्वासों के आधार पर मंदिर के निर्माण का फैसला किया जा सकता है और किया जाना चाहिए। गांवों में आज भी जहां हिंदू बहुसंख्यक आबादी होती है, मंदिर की एक प्रमुख सार्वजनिक स्थल व सामाजिक गतिविधियों के केंद्र के रूप में स्थापना होती है। जब मेरे गांव में एकमात्र मंदिर के निर्माण के लिए गांव जुटा था तो हमने उसको सहयोग इस आधार पर किया था कि वह गांव की सकारात्मक गतिविधियों का एक केंद्र बनकर रहेगा और इससे एक परिवार का पेट भी पलेगा। जो लोग मंदिर नहीं, अस्पताल चाहिए-के नारे को यदि राम मंदिर के निर्माण से जोड़ते हैं, वे चीजों को गड्डमड्ढ करके राजनीतिक उल्लू सीधा करना चाहते हैं। राम मंदिर राष्ट्र के सर्वमान्य महानायक की स्मृति से जुड़ा सबसे महत्वपूर्ण स्मारक है जो सिर्फ भारत में ही हो सकता है।
इसलिए हमें मंदिर नहीं की बजाय मंदिर के साथ अस्पताल की बात कहना चाहिए। मैं तो समझता हूं कि मंदिर के साथ अस्पताल ही क्या, शैक्षणिक संस्थाएं, अनाथालय, वृद्धाश्रम, भोजनालय सब कुछ होना चाहिए। यह मंदिर के चरित्र में रहा है। इसे हमने भुला दिया और हम मंदिरों की आय का स्वर्ण पत्तर चढ़ाने, मंदिर का विस्तार करने जैसे कामों में ही उपयोग करने को मूल कार्य मान बैठे। बड़े-बड़े मंदिरों में लबालब भरी दान की पेटियां किसके कितने काम आती हैं। कितने महामंदिरों की तरफ से उक्त सेवाएं चलाई जाती हैं। मध्यप्रदेश के सबसे बड़े महाकाल मंदिर का ही कोई प्रमुख अस्पताल (परिसर में छोटी सी डिस्पेंसरी व एंबुलेंस को छोड़कर), कॉलेज, स्कूल (वेद विद्या प्रतिष्ठान को छोड़कर), अनाथाश्रम, वृद्धाश्रम नहीं है। समिति से जुड़े एक व्यक्ति का कहना है कि मंदिर सरकारी है जो राज्य के धर्मस्व विभाग के अंतर्गत आता है इसलिए उसकी योजनाओं व दिशानिर्देशों पर ही काम होता है। सरकार के धर्मस्व विभाग के पास सेवाओं का कोई ब्ल्यू प्रिंट नहीं है।
और मंदिर ही क्यों, कितनी मस्जिदें और चैत्यालय इसकी पहल करते हैं। दक्षिण के विशाल मंदिर इस मामले में कुछ पहल करते दिखते हैं। किंतु वे भी अपनी आय का छोटा हिस्सा ही खर्च करते हैं। तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम ट्रस्ट के 2937 करोड़ के बजट में से दस करोड़ भी शिक्षा व स्वास्थ्य पर खर्च नहीं होता। 2015 में इस मंदिर के पास सात हजार करोड़ रुपए की बैंक जमा राशि थी। स्तंभकार व लेखक टीवी मोहनदास पई ने एक लेख लिखकर सुझाव दिया था कि आय के एक हिस्से से ही सैकड़ों स्कूल व अस्पताल खुल सकते हैं। यह सुझाव भी दिया गया कि जिस तरह कॉरपोरेट को अपने लाभ का दो प्रतिशत अनिवार्य रूप से सामाजिक सेवाओं पर खर्च करना होता है, वैसे ही धर्म स्थलों की पचास प्रतिशत आय को समाज पर व्यय करना अनिवार्य करना चाहिए।
सवाल सिर्फ सेवा का है। जैन समाज के चतुर्विध सिंद्धांतो में कहा गया है कि अपने धन में से अतिरिक्त (अपरिग्रह) का उपयोग आहार (भोजनालय अथवा लंगर), अभय (जीवरक्षा), भेषज (चिकित्सा) और शास्त्र (शिक्षा यानी शैक्षणिक संस्थाओं) के लिए किया जाए। सिख समुदाय ने सेवा को अपने समाज के चरित्र में शामिल किया। गुरुद्वारों द्वारा हर शहर में लंगर लगाना इसका एक हिस्सा है। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में चौबीस घंटे इतना बड़ा लंगर चलता है कि जिसकी वजह से कहा जाता है कि इस शहर में कभी कोई भूखा नहीं सोता। यहां बड़े से बड़ा अफसर भी झाड़ू लगाकर या बर्तन मांजकर अपने को धन्य मानता है।
इसी तरह, ईसाई संस्थाओं का मामला है। सेवा उनके चरित्र में है। चर्च और ईसाई संगठन अच्छे अस्पताल और आश्रम चलाते हैं। इसका खराब पक्ष यह है कि भारत में सेवा के पीछे धर्मांतरण की मंशा भी रहती है। अंगरेजी साम्राज्य ही इस वृत्ति को लेकर आया था जो आज तक जारी है। किंतु हम यह कहेंगे कि धन का एक बड़ा हिस्सा सेवा कार्यों में व्यय होता है जिसका आम आदमी को भी लाभ मिलता है। हिंदुओं की कई अवैध संतानों को उसके आश्रमों ने पाला। यद्यपि उन्हें विदेशों में गलत हाथों में गोद देने की शिकायतें भी आती रही हैं। लेकिन यहां सवाल है कि दूसरे समुदायों ने अपने बच्चों या अन्य जरूरतमंदों के लिए इस तरह की कितनी सेवाएं संचालित कीं और ईमानदारी व भ्रष्टाचारमुक्त।
यद्यपि समाज में आश्रमों की कतार है और कई दानियों के दान और कर्मवीरों के परिश्रम से कई अच्छे आश्रम, अस्पताल व विद्यालय-महाविद्यालय चल रहे हैं। जिनमें से कई के भ्रष्टाचार व अनैतिक गतिविधियों में लिप्त होने की खबरें हम आए दिन पढ़ते-सुनते हैं या उस तरह के खतरे से वे दोचार होते हैं। मेरा मानना है कि यदि इनका संचालन धर्मस्थल व धार्मिक संस्थाएं करेंगी तो इस बुराई से काफी हद तक मुक्त रह सकती हैं क्योंकि धर्म अंतत: नैतिक आचारसंहिता से जुड़ा होता है। एक तरह से तो नैतिकता ही धर्म है। इसलिए हमारा संकेद्रण मानव सेवा की तरफ होना चाहिए।
कोविड के दौर में इसकी उपादेयता का भान हो रहा है। कितने ही लोगों ने रोजगार खो दिया और कितने ही लोग असहाय हो गए। सात साल पहले हुए एक अध्ययन में बताया गया था कि चालीस प्रतिशत लोग तो गरीबी की तरफ सिर्फ दवाओं और चिकित्सा सुविधाओं की ऊंची लागत और चिकित्सा तंत्र की कमी के कारण धकेल दिये जाते हैं। कोविड काल में यदि अधिकतर परिवारों का व्यक्तिगत आय को बड़ा हिस्सा किसी काम पर खर्च हो रहा है तो वह चिकित्सा है। स्टेट बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार लोगों के पचास हजार करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं। हर परिवार को निजी अस्पतालों में औसतन डेढ़ लाख रुपए खर्च करने पड़े हैं और उसका चिकित्सा पर खर्च 11 प्रतिशत बढ़ गया है। इसलिए इस मामले में सरकार पर निर्भर नहीं रहा जा सकता जिसका स्वास्थ्य बजट हमारी सकल घरेलू आय के दो प्रतिशत से भी कम है और जिसके पास 36 हजार लोगों के पीछे एक स्वास्थ्य केंद्र है जिसमें साठ प्रतिशत एक चिकित्सक के भरोसे चल रहे हैं।
एक सरकारी आंकड़े के अनुसार कोविड ने आधिकारिक रूप से 577 बच्चों को अनाथ कर दिया है। इन बच्चों को कौन पालेगा। स्वाभाविक रूप से ऐसे में ईसाई मिशनरियों की तरफ जनमानस की निगाह जाती है और जैसा कि अनुभव है कि गरीबी और आपदा में इन संस्थाओं को धर्मांतरण का अनुकूल अवसर मिलता है। (इसी हफ्ते रतलाम जिले में किल कोरोना अभियान में एक चिकित्सक को इसी तरह की शिकायत के बाद पद से पृथक करने का नोटिस दिया गया है।) ऐसे में हमारी संस्थाओं और धार्मिक न्यासों को आगे आकर अपनी सेवाओं का विस्तार कर आम आदमी की जरूरत में मददगार बनने की जरूरत है। साथ ही, हर गांव को अपने एक मंदिर या मस्जिद के साथ अब एक अस्पताल या सेवा और सहारे का कोई काम हाथ में लेना चाहिए। नर सेवा ही नारायण सेवा के मंत्र को याद करना चाहिए। (लेखक स्वदेश के कार्यकारी संपादक हैं। )

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