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दक्षिणी चीनसागर में चीनी विस्तारवाद

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डॉ. नवीन कुमार मिश्र
वृहद भारत के अंतर्गत दक्षिणी चीन सागर को मलयसागर के नाम से जाना जाता था। परन्तु चीन की फितरत है कि अपनी विस्तारवादी नीति को बढ़ाने के लिये दक्षिणी चीन सागर में अपनी आक्रामकता से तनाव की स्थिति बनाये हुये है। वर्ष 1949 से चीन यू-शेप नाइन-डैश लाइन के माध्यम से दक्षिणी चीन सागर के 80 प्रतिशत भाग पर अपने अधिकार का दावा करता है। इसके आधार पर दक्षिणी चीन सागर में वियतनाम के स्पार्टली और पार्सल द्वीप समूह,फिलीपीन्स का स्कारबोरो शोल द्वीप, इंडोनेशिया का नातुना सागर क्षेत्र व ताइवान पर अपना दावा करने से विवाद की स्थिति बनी हुई है।
नाइन डैश लाइन पर फिलीपीन्स, ब्रुनेई, मलेशिया, ताइवान और वियतनाम कई दशकों से दक्षिणी चीन सागर पर चीन के दावों पर सवाल उठा रहे हैं और हाल के वर्षों में यह तनाव काफी बढ़ गया है। वर्ष 2016 में एक अंतर्राष्ट्रीय ट्राइब्यूनल ने चीन के खिलाफ़ फ़ैसला दिया था कि इस बात के कोई प्रमाण नहीं हैं कि चीन का इस इलाक़े पर ऐतिहासिक रूप से कोई अधिकार रहा है लेकिन चीन ने इस फ़ैसले को मानने से इनकार कर दिया। साथ ही अपने दावे के समर्थन में वहाँ कृत्रिम द्वीपों का निर्माण कर सैन्य अड्डे स्थापित कर लिए हैं।
अपनी विस्तारवादी नीति के तहत वर्ष 2012 में चीन ने फिलीपीन्स के एक छोटे से द्वीप स्कारबरो शोल पर क़ब्ज़ा कर लिया जो समुद्री तूफानों में मछली पकडऩे वाले जहाजों के लिये रक्षक का काम करते हैं। फिलीपीन्स के आंतरिक हिस्से में स्थित थिटू द्वीप के पास से चीन की संदिग्ध गतिविधियां पाई गईं। चीन की लम्बे समय तक उपस्थिति और मछली मारने के नावों की अवैध गतिविधियों के खिलाफ फिलीपीन्स के द्वारा कई बार राजनयिक विरोध दर्ज कराया परन्तु चीन उसे अनसुना कर देता है। चीन की पनडुब्बियों के घुसपैठ का विरोध भी फिलीपीन्स कर चुका है। फिलीपीन्स द्वारा बाजो डी मासिनलोक और पैग आसा द्वीप के निकट सैन्य अभ्यास करने को लेकर भी विवाद बना हुआ है।
फिलीपीन्स के राष्ट्रपति रोड्रिगो दुतेर्ते ने चीन के साथ युद्ध के अलावा और कोई रास्ता नहीं होने की कड़ी प्रतिक्रिया देकर चीनी विस्तारवाद पर लगाम लगाने का प्रयास किया है। दक्षिणी चीन सागर प्रशांत महासागर के पश्चिमी व चीन के दक्षिण में स्थित एक सीमांत सागर है जो सिंगापुर से लेकर ताइवान की खाड़ी तक लगभग 35 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में विस्तृत है। यह प्रशांत महासागर और हिंद महासागर के बीच स्थित महत्वपूर्ण क्षेत्र है, जहाँ विश्व के कुल सागरीय व्यापार का 20 प्रतिशत भाग इसी मार्ग से जाता है।
वर्ष 2016 में 6 खऱब डॉलर का सागरीय व्यापार इसी मार्ग से हुआ था। चीन अपनी आक्रामकता से दक्षिणी चीन सागर से होने वाले व्यापार पर अपना नियंत्रण कर आर्थिक लाभ चाहता है। स्पार्टली और पार्सल द्वीप पर कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के भण्डार होने के कारण चीन इन पर कब्जा करना चाहता है। चीन को प्राकृतिक तेल की आपूर्ति मध्य-पूर्व के देशों द्वारा मलक्का जलडमरुमध्य के रास्ते से होती है। चीन को दक्षिणी चीन सागर में अपने भू-आर्थिक और भू-सामरिक हित दिखाई देता हैं। दक्षिणी चीन सागर में 11 बिलियन बैरल प्राकृतिक तेल, 190 ट्रिलियन क्यूबिक फीट प्राकृतिक गैस के भण्डार का अनुमान है,जिसकी संभावना 280 ट्रिलियन क्यूबिक फीट है। इस क्षेत्र से प्रत्येक वर्ष पाँच ट्रिलियन डॉलर का अंतर्राष्ट्रीय व्यापार होता है।
तेल और गैस के साथ ही मछलियों की हज़ारों नस्लें पायी जाती है। सम्पूर्ण विश्व के मछलियों के व्यापार का 55 प्रतिशत हिस्सा या तो दक्षिणी चीन सागर से गुजऱता हैया वहाँ पाया जाता है।इसकी भौगोलिक स्थिति के कारण इसका सामरिक महत्त्व भी बढ़ जाता है। इसलिए चीन की कुदृष्टि दक्षिणी चीन सागर पर है। चीन ने कई द्वीपों पर अवैध कार्य कर अंतर्राष्ट्रीय कानूनों का उल्लंघन किया है, कृत्रिम द्वीप बनाये हैं और संसाधन अन्वेषण के लिये सर्वे भी आयोजित किया है।
चीन की इन करतूतों से दक्षिणी चीन सागर में मूंगे की चट्टानों और सागरीय पर्यावरण को भारी क्षति हुई है। फिलीपीन्स के अलावा ब्रूनेई, मलेशिया, ताइवान और वियतनाम दशकों से पूरे दक्षिणी चीन सागर पर चीन से दावों पर सवाल उठा रहे हैं जिससे हाल के वर्षों में तनाव काफी बढ़ गया है। चीन के विस्तारवादी नीति पर लगाम लगाने के लिये भारत को दक्षिणी-पूर्वी एशिया के देशों साथ अपने हजारों वर्षों पुराने रिश्ते को पुनर्जीवित करना होगा,जहाँ पर वृहद भारत के व्यापारिक व सांस्कृतिक रिश्ते रहे है।
राष्ट्रीय सुरक्षा जागरण मंच द्वारा वर्ष 2019 में हिमालय-हिन्द महासागर राष्ट्र समूह (हर्ष) का गठन करके इस दिशा में सफल प्रयास किये जा रहे है। इसके साथ ही भारत के नेतृत्व में अमेरिका, जापान, आस्ट्रेलिया ने साथ मिलकर पिछले दिनों क्वाड समूह बनाया गया है, जिसकी भूमिका को और प्रभावी बनाने की बात की गयी है। इसका लक्ष्य हिन्द व प्रशान्त महासागरीय क्षेत्र में चीन की आक्रामक कार्यवाहियों के बीच नियम आधारित व्यवस्था को मजबूत करना है। इससे चीन के विस्तारवादी नीति पर अंकुश लगेगा जिससे हिन्द-प्रशान्त महासागर को मुक्त बनाये रखने में सहायक होगा।
(लेखक विदेशी मामलों के अध्येता हैं। )

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