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चीन के विस्तारवादी नीति के शिकंजे में श्रीलंका

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डॉ. नवीन कुमार मिश्र
चीन अपने विस्तारवादी नीति के तहत श्रीलंका को कर्ज के मकडज़ाल में फंसाकर अपने शिकंजे में कसता जा रहा है। श्रीलंका पर चीन के प्रभाव का अनुमान इस बात से लग जाता है कि 20 मई को एक बिल श्रीलंका की संसद में पास हुआ और 24 मई को ‘श्रीलंका पोर्ट सिटीÓ के कंस्ट्रक्शन का ठेका,जो कोलंबो बंदरगाह के पास 153 एकड़ की जगह है,एक चीनी कंपनी ‘चायना कम्युनिकेशन एंड कंस्ट्रक्शनÓ को दे दिया गया। चीन कोलंबो पोर्ट सिटी में श्रीलंका का पहला ‘स्पेशल इकोनॉमिक जोनÓ यानी सेज का निर्माण करेगा जिसमें सभी देश की मुद्रा में व्यापार किया जा सकेगा। साथ ही चीन द्वारा इसे ‘दक्षिण एशिया का प्रवेश द्वारÓ बनाने के सपने दिखाये गये है। श्रीलंका की राजधानी कोलंबो में इंफास्ट्रक्चर निर्माण के लिए 1.4 बिलियन डॉलर का निवेश चीन पहले ही कर चुका है। इससे पूर्व में चीन ने हंबनटोटा बंदरगाह के विकास के सपने दिखाकर अरबों रुपये के कर्ज के जाल में श्रीलंका को फंसाकर दिसम्बर 2017 इसे अपने कब्जे में ले लिया। कोलंबो पोर्ट सिटी भी 99 साल की लीज की शर्त साथ चीन को सौपने से स्थानीय लोगों में ग़ुस्सा है और ऐसी भावना उभरकर आयी है कि उनका देश ‘चीन को बेचाÓ जा रहा है।
हिन्द महासागर में श्रीलंका की भौगोलिक स्थिति के कारण हंबनटोटा पोर्ट ‘बेल्ट एंड रोडÓ के लिये महत्वपूर्ण है जो चीन और यूरोप के बीच बंदरगाहों और सड़कों को जोड़ेगा। चीन के प्रभाव के कारण वर्ष 2019 में भारत,जापान व श्रीलंका के सम्मलित ‘ट्रांसशिपमेंट प्रोजेक्टÓ को फरवरी 2021 में श्रीलंका ने रद्द कर दिया जिसमें 51 प्रतिशत हिस्सा श्रीलंका का था। इस परियोजना पर 700 मिलियन डॉलर तक का खर्च आने का अनुमान था। श्रीलंका ने जापान की मदद से बनने वाली डेढ़ अरब डॉलर की लागत का एक लाइट रेल परियोजना को भी चीन के इशारे पर रद्द कर चुका है।
यूरेशियन टाइम्स के अनुसार श्रीलंका ने 2005 से 2019 के बीच 34 अरब डॉलर का कर्ज ले चुका है जिसमें चीन का 33 प्रतिशत हिस्सा है। कोलंबो स्थित एशिया के लिये रणनीतिक विश्लेषण प्रदान करने वाला निजी क्षेत्र का थिंक टैंक ‘वेरिते रिसर्चÓ के अनुसार इनमें से ज्यादातर कर्ज इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं के लिये लिया गया था। अब समय उस कर्ज को चुकाने का है, लेकिन महामारी के कारण श्रीलंका तय कार्यक्रम के मुताबिक कर्ज चुकाने की स्थिति में नहीं है।कोरोना महामारी के कारण देश की अर्थव्यवस्था गहरे संकट में है। ऐसे में कर्ज चुकाने की चुनौती और गंभीर हो गई है।इसलिए चीन के कर्ज के जाल में श्रीलंका के फंस जाने का अंदेशा गहरा हो गया है। चीनी कर्ज के चक्रव्यूह से बाहर आने का कोई आसान रास्ता भी नहीं दिख रहा। श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार 530 करोड़ डॉलर है जबकि उसे इस साल 710 करोड़ डॉलर की अदायगी करनी है। श्रीलंका के बाह्य संसाधन विभाग के अनुसार वर्ष 2021 से 2025 के बीच श्रीलंका को 2370 करोड़ डॉलर का कर्ज अदा करना है। बेल्ट एंड रोड परियोजना के एक अहम हिस्से ‘मैरीटाइम सिल्क रोडÓ के तहत चीन और श्रीलंका के बीच किये गये निवेश समझौतों में पारदर्शिता नहीं रही थी। निवेश की कठिन शर्तों, ऋण न वापस करने की स्थिति में दण्डकारी प्रावधानों ने इस स्थिति को और खराब कर दिया है। चीन अपने कर्ज के जाल में फंसा कर अपनी तथाकथित ‘स्ट्रिंग ऑफ पल्र्सÓ या ‘मोतियों की मालाÓ रणनीति के तहत दक्षिण एशिया में अपना विस्तार कर रहा है।हालांकि चीन की विस्तारवादी फितरत उससे लगी सीमायों और सीमायों से परे हिमालय से लेकर सुदूर महासागरों तक है। इस परिस्थितियों में क्वाडिलेटरल डायलग (क्वाड) जिसमें भारत, अमेरिका, जापान सक्रिय है को आगे आकर हिन्दमहासागर में चीन कीबढ़ती आक्रामकता व कर्ज के मकडज़ाल में फंसे श्रीलंका व अन्य देशों को भी निकालना होगा जिसने चीन से कर्ज लिया है।चीन क्वाड को अपने विस्तारवाद में बाधक समझता है, इसलिए चीड़कर पहले ही बांग्लादेश को दूर रहने की नसीहत दे चुका है। भारत, अमेरिका और विश्व की अन्य शक्तियाँ जिनकी जमीन पर चीन अपना जबरन दावा पेश करता है,सभी को मिलकर चीन के बढ़ते सैन्य युद्धाभ्यास और आक्रामक गतिविधियों की पृष्ठभूमि में एक स्वतंत्र, मुक्त, सम्पन्नहिन्दमहासागर की आवश्यकता को सुनिश्चित करना होगा। (लेखक : भू-राजनीति केजानकार)

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