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चीनी जैविक हथियार तो नहीं कोरोना वायरस ?

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कोरोना वायरस के अस्तित्व में आने के बाद से ही ये आशंकाएं बनी हुई हैं, कि दुनिया के जैव प्रौद्योगिकी में सक्षम देश जैविक या कीटाणु हथियार (बायोवेपन) बनाने में लगे हुए हैं। इन हथियारों से कम खर्चे पर बड़ी ताबाही मचाई जा सकती है। रूस अत्यंत खतरनाक इबोला वायरस को जैविक औजार के रूप में निर्माण की तैयारी में लगा है। इस गोपनीय परियोजना को ‘टोलेडोÓ का नाम दिया है। टोलेडो स्पेन का एक नगर है, जहां प्लेग फैलने से बड़ी संख्या में लोग काल के गाल में समा गए थे। इबोला के साथ-साथ मारबर्ग वायरस को भी रूस ने टोलेडो परियोजना में शामिल किया हुआ है। इस विषाणु से संक्रमित लोगों में से 88 प्रतिशत की मौत हो जाती है। दरअसल चीन से उपजे कोरोना वायरस ने जैविक हथियारों का नया रास्ता खोल दिया है। इस तरह के औजारों में जीवाणु, विषाणु, कीटाणु, फफूंद और जैविक आविष (पेड़-पौधों व जंतुओं में पैदा होने वाले जहरीले पदार्थ) जैसे संक्रमण फैलाने वाले जीवाणुओं एवं विषाणुओं का उपयोग किया जाता है। जिस क्षेत्र में भी इनकी मौजूदगी हो जाती है, वहां ये बहुगुणित होकर तेजी से फैलते हैं और लोगों को मौत के घाट उतारते चलते हैं। सैन्य-युद्ध में जैविक औजारों का प्रयोग पूरी तरह निषिद्ध है। इसीलिए इन पर नियंत्रण के लिए ‘जैविक और घातक औजार संधि (बीटीडब्लूसी) अस्तित्व में है, लेकिन चोरी-छुपे सक्षम देश जैविक हथियार बनाने से न तो बाज आ रहे है और न ही इस्तेमाल से।
भारत में कोविड-19 नाम के चीनी विषाणु की दूसरी लहर ने तबाही मचा दी है। हालांकि इस वायरस का तांडव पूरी दुनिया में कहर ढा रहा है। लेकिन भारत में कुछ ज्यादा ही है। इसका अंदाजा इसी तथ्य से हो जाता है कि अकेले महाराष्ट्र में कोरोना के जितने रोगी हैं, उतने दुनिया के 150 देशों में भी नहीं है। इसलिए भारत में खौफ का मंजर छाया हुआ है। बीमारी से कहीं ज्यादा भय से लोग मर रहे हैं। इसलिए यह संदेह उठना स्वाभाविक है कि कहीं यह वायरस जैविक हथियार तो नहीं है ? यह सवाल इसलिए भी उठता है कि कोरोना की पहली लहर को हमने अत्यंत कामयाबी के साथ परास्त कर दिया था, जबकि दूसरी लहर में कोरोना का स्वरूप न केवल भयंकर है, बल्कि बार-बार रूप भी बदल रहा है। आंध्र-प्रदेश में मिले कोरोना के नए वायरस को 15 गुणा अधिक घातक बताया गया है। इसलिए शंकाएं निराधार नहीं हैं। जापान के नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक ने कहा भी है कि यह प्राकृतिक वायरस नहीं है। इसे प्रयोगशाला में बनाया गया है। इसलिए यह बर्फीले देशों से लेकर मरुस्थलीय गर्म देशों में भी कहर बरपा रहा है। यदि यह प्राकृतिक होता तो किसी एक विशेष मोसम में ही असर डालता ? आम तौर से जैविक औजारों को बनाने में उन अदृश्य सूक्ष्म जीवों को प्रयोग में लाया जाता है, जो विभिन्न सतहों पर अनेक दिन तक जीवित रहते हैं। इनके अलावा कीटाणुओं, फफूंदों और जहरीले जीव-जुंतुओं एवं पेड़-पौधों से विष निकालकर भी जनसंहार किया जाता है। चूंकि यह औजार बिना कोई धमाका किए कुछ दिनों बाद लोगों में बीमारी के रूप में उभरता है, इसलिए इसका एकाएक अंदाजा लगाना मुश्किल होता है। जब तक इसकी पहचान होती है, तब तक यह कई बस्तियों को तबाह कर चुका होता है। जैविक हमला खाद्य पदार्थों, फसलों और जल-स्रोतों के माध्यम से भी किया जाता है। जल में विष मिलाकर पूरे जल-स्रोत को जहरीला बना दिया जाता है। जीवाणु-विषाणु से संक्रमित व्यक्ति को स्वस्थ्य आबाद इलाकों में भेजकर भी संक्रमण फैलाने का काम कर दिया जाता है। पत्रों के जरिए भी संक्रमण फैलाने की जानकारियां हैं। हथियार प्रणाली के रूप में जैविक पाउडर के बम, कीटाणु बम और स्प्रे गन का इस्तेमाल बीमारी फैलाने में किया जाता है। जैविक युद्ध का वैसे तो कोई इतिहास नहीं मिलता है, लेकिन धर्म व इतिहास की कुछ पुस्तकों में ऐसे संकेत मिलते हैं, जिनसे ज्ञात होता है कि जैविक हथियारों के बारे में लोग ज्ञान रखते थे। भगवान कृष्ण ने प्रभाष क्षेत्र में जिस एरका घास को औजार के रूप में प्रयोग कर अपने वंशजों का नाश किया था, वह कुछ और नहीं जैविक हथियार ही थे। बारहवीं शताब्दी के हत्ती साहित्य में जैविक युद्ध का विवरण है। इस युद्ध में तुलारेनिया नामक संक्रामक बुखार के रोगियों को युद्ध में भेजा गया था। यह बुखार त्वचा के जरिए संक्रमित कर दुश्मन के क्षेत्र में फैला दिया जाता था। विषैले तीरों का जिक्र रामायण-महाभारत के साथ दुनिया के अन्य प्रमुख युद्धों में मिलता है। यूनान में हुए धर्मयुद्ध में प्राचीन किराह प्रांत के जल-स्रोतों में विष वाले पौधों को मिलाया गया था। ऐसी धारणा है कि 1346 में काफा (थियोडोशिया) पर कब्जे की लड़ाई में मंगोल शासकों ने प्लेग से मरे जवानों का उपयोग जैविक हथियार के रूप में किया था। इससे विपक्षी सेना में महामारी फैल गई थी। 1710 में स्वीडन के साथ हुए युद्ध में रूसी सेनाओं ने प्लेग से मरे लोगों के शव रेवल (तालिन) में छोड़ दिए थे। इसी तरह 1785 में ला काले पर नियंत्रण के लिए ट्यूनेशियाई सेना ने वस्त्रों के माध्यम से संक्रमण फैला दिया था। प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी ने दुश्मन देशों की फसलें बर्बाद करने और मवेशियों को संक्रमित करने के लिए एंथे्रक्स व ग्लैंडर्स को जरिया बनाया था। 1940 में ब्रिटेन और अमेरिका ने तुलारेमिया, एंथ्रेक्स, ब्रूसेलोसिस व बॉट्यूलिज्म के जरिए जैविक हथियार तैयार किए थे। 1930 से 40 के बीच चीन और जापान के बीच हुए युद्ध में जापानी वायुसेना ने निंग्बों शहर पर प्लेग से संक्रमित कीटाणुओं से भरे सेरेमिक बम गिराए थे। चूंकि जैविक युद्ध बेहद घातक है, इसलिए 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ के माध्यम से जैविक हथियार संधि वजूद में आई, जिसे 170 देशों ने मान्यता दी हुई है। इस संधि के तहत जैविक हथियारों के उत्पादन, एकत्रिकरण और प्रयोग पर प्रतिबंध हैं, लेकिन रूस और चीन जैसे देश गोपनीय ढंग से जैविक हथियारों के निर्माण में लगे हुए हैं। इसीलिए कोविड-19 वायरस का जन्म वुहान की प्रयोगशाला से हुआ माना जा रहा है।
प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंग ने मानव समुदाय को सुरक्षित बनाए रखने की दृष्टि से जो चेतावनियां दी हैं, उनमें एक चेतावनी जेनेटिकली इंजीनियरिंग अर्थात आनुवांशिक अभियंत्रिकी से खिलवाड़ करना भी है। आजकल खासतौर से चीन और अमेरिकी वैज्ञानिक विषाणु (वायरस) और जीवाणु (बैक्टीरिया) से प्रयोगशालाओं में छेड़छाड़ कर एक तो नए वीषाणु व जीवाणुओं के उत्पादन में लगे हैं, दूसरे उनकी मूल प्रकृति में बदलाव कर उन्हें और ज्यादा सक्षम व खतरनाक बना रहे हैं। इनका उत्पादन मानव स्वास्थ्य के हित के बहाने किया जा रहा है। लेकिन ये कोरोना की तरह ही बेकाबू होते रहे तो तमाम मुश्किलों का भी सामना दुनिया को करना पड़ सकता है ? कई देश अपनी सुरक्षा के लिए घातक वायरसों का उत्पादन कर खतरनाक जैविक हथियार बना रहे हैं। अमेरिका के विस्कोसिन-मेडिसन विवि के वैज्ञानिक योशिहिरो कावाओका ने स्वाइन फ्लू के वायरस के साथ छेड़छाड़ कर उसे इतना ताकतवर बना दिया है कि मनुष्य शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली उसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। मसलन मानव प्रतिरक्षा तंत्र उस पर बेअसर रहेगा। यहां सवाल उठता है कि खतरनाक वीषाणु को आखिर और खतरनाक बनाने का औचित्य क्या है ? कावाओका का दावा है कि उनका प्रयोग 2009 एच-1, एन-1 विषाणु में होने वाले बदलाव पर नजर रखने के हिसाब से नए आकार में ढाला गया है।
वैक्सीन में सुधार करने के लिए उन्होंने वायरस को ऐसा बना दिया है कि मानव की रोग प्रतिरोधक प्रणाली से बच निकले। मसलन रोग के विरुद्ध मनुष्य को कोई सरंक्षण हासिल नहीं है। कावाओका ने यह भी दावा किया था कि उन्होंने 2014 में रिर्वस जेनेटिक्स तकनीक का प्रयोग कर 1918 में फैले स्पेनिश फ्लू जैसा जीवाणु बनाया है, जिसकी वजह से प्रथम विश्व युद्ध के बाद 5 करोड़ लोग मारे गए थे। पोलियो, रैबिज और चिकनपॉक्स जैसे घातक रोगों के वैक्सीन पर उल्लेखनीय काम करने वाले वैज्ञानिक स्टेनली प्लॉटकिन ने भी कावाओका के काम के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा था, ऐसी कोई सरकार या दवा कंपनी है, जो ऐसे रोगों के विरुद्ध वैक्सीन बनाएगी जो वर्तमान में मौजूद ही नहीं हैं ?
कावाओका द्वारा प्रयोगशाला में उत्पादित किए जा रहे, इन खतरनक वायरसों के बारे में रॉयल सोसायटी के पूर्व अघ्यक्ष व ब्रिटिश सरकार के पूर्व विज्ञान सलाहकार लॉर्ड-मे ने भी इन प्रयोगों पर गहरी आपत्ति जताई थी। उन्होंने इन प्रयोगों को पागल करार देते हुए, यहां तक कहा था कि यह प्रक्रिया बेहद खतरनाक है और यह खतरा प्राणियों में मौजूद वायरस से नहीं, अत्याधिक महत्वाकांक्षी वैज्ञानिकों की प्रयोगशालाओं से निकलने वाले वायरसों से है। दरअसल विषाणु या जीवाणु में वैज्ञानिक कोई आनुवांशिक रूप से परिवर्तन करना चाहते हैं तो उन्हें ऐसे बदलाव करना चाहिए जो मानव समुदाय के साथ समस्त जीव-जगत के लिए लाभदायी हों ?
हम आए दिन नए-नए बैक्टीरिया व वायरसों के उत्पादन की खबरें पढ़ते रहते हैं। त्वचा कैंसर के उपचार के लिए टी-वैक थैरेपी की खोज की गई है। इसके अनुसार शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को ही विकसित कर कैंसर से लड़ा जाएगा। इस सिलसिले में स्टीफन हॉकिंग ने सचेत किया था कि इस तरीके में बहुत जोखिम है। क्योंकि जीन को मोडीफाइड करने के दुष्प्रभावों के बारे में अभी तक वैज्ञानिक खोजें न तो बहुत अधिक विकसित हो पाई हैं और न ही उनके निष्कर्षों का सटीक परीक्षण हुआ है। उन्होंने यह भी आशंका जताई थी कि प्रयोगशालाओं में जीन परिवर्धित करके जो विषाणु-जीवाणु अस्तित्व में लाए जा रहे हैं, हो सकता है, उनके तोड़ के लिए किसी के पास एंटी-बायोटिक एवं एंटी-वायरल ड्रग्स ही न हों ? कोरोना को लेकर पूरी दुनिया में यही स्थिति फिलहाल बनी हुई है।
प्रमोद भार्गव

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