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कौन सूत्रधार और कौन कठपुतली

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कैलाशचन्द्र पन्त
भारत विरोधी एजेन्डा तो अंग्रेजों के भारत में आने के बाद ही शुरू हो गया था। भारत की रीढ़ की हड्डी उसकी संस्कृति और दर्शन रहे। उसे तोडऩे के क्रम में सबसे पहले परंपरागत शिक्षा समाप्त कर नई शिक्षा पद्धति लागू की गई। संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन को समाप्त किया गया। उद्देश्य एक ही था-भारत के लोगों को उसके अतीत से उच्छेदित कर दिया जाए। आश्चर्यजनक यह है कि अंग्रेज शासक यह करने में बड़ी सीमा तक सफल रहे। स्वतंत्रता के बाद भी भारतीयों का एक वर्ग उन मान्यताओं को दोहराता रहा जिसे अंग्रजों ने शिक्षा के माध्यम से भारतीयों के दिमाग में भर दिया था। यह कहना ज्यादा सही होगा कि मानसिक गुलामी की जकड़ इतनी मजबूत कर दी गई कि हम राजनीतिक स्वतंत्रता के 73 वर्षों बाद भी उससे मुक्त नहीं हो पा रहे हैं। स्थिति तब ज्यादा भयावह लगती है जब भारत विरोधी एजेन्डा के सूत्रधार विदेशों में बैठकर जो पाठ तैयार करते हैं उसे भारत के ही नेता, पत्रकार और बुद्धिजीवी कठपुतली की तरह दोहराते हैं।
इन गतिविधियों का और इनके पीछे छिपे उद्देश्यों को समझने में यदि चूक हो गई तो देश को खतरनाक स्थिति का सामना करना पड़ेगा। आजादी के कुछ वर्षों पूर्व तक की स्थिति का विश्लेषण कुछ निष्कर्षों तक पहुंँचाने में सहायक हो सकता है। यह सब जानते हैं कि कांग्रेस संगठन की स्थापना एक अंग्रेज अधिकारी ए.ओ. ह्यूम ने की थी। इसमें मुख्यत: उद्योग, वकालत, शिक्षा और सामाजिक कार्यों से जुड़े प्रबुद्ध लोग शामिल हुए। उनका तात्कालिक उद्देश्य ब्रिटिश सरकार को भारत में प्रशासनिक सुधार करने के सुझाव देना और धीरे धीरे जनता को ऐसे अधिकार दिलाना था जिससे वह सरकार के संचालन में अपनी हिस्सेदारी का आभास पा सके। कांग्रेस के प्रारंभिक वर्षों की बैठकों और अधिवेशनों में पारित प्रस्तावों से स्पष्ट हो जाता है कि ब्रिटिश सम्राट/साम्राज्ञी के प्रति पूरी वफादारी की बात की जाती रही। लोकमान्य तिलक के कांग्रेस प्रदेश ने नई हलचल पैदा की। तिलक एक तरफ महाराष्ट्र में सामाजिक जागरण के कार्यक्रम संचालित कर देशभक्ति का पाठ पढ़ा रहे थे तो दूसरी तरफ कांग्रेस के मंच से ”स्वराज्य मेरा जन्मसिद्ध अधिकार हैÓÓ का नारा लगा रहे थे। यह नारा अंग्रेज शासकों को चौंकाने के लिए काफी था। उन्हें अंग्रेज शासकों ने मांडले जेल भेजा था। इस नारे के पीछे राष्ट्र-बोध था। विदेशी शासक इसे ही खतरा मानते थे। वे तो भारत को आत्म विस्मृति में डालना चाहते रहे, पर राष्ट्रबोध की चेतना का अर्थ ही स्मृति की ओर लौटना था।
सूरत में कांग्रेस अधिवेशन में कांग्रेस में जो विभाजन हुआ था, उसका बुनियादी कारण राष्ट्रवाद की वैचारिक अवधारणा ही था। इसे गरम दल और नरम दल के मतभेद की तरह प्रचारित किया गया। 1918 तक आते आते लोकमान्य को राजनीति में हशिये में डालने के प्रयास परदे के पीछे शुरू हो गए थे। तिलक, लाला लाजपतराय, विपिन पाल (लाल, बाल, पाल की जोड़ी) पूरे देश में चर्चित थी। श्री अरविंद घोष ने जब वन्दे मातरम को आजादी का मंत्र बनाया तो उन्हें भी अन्तत: राजनीति से सन्यास लेना पड़ा। क्योंकि इस मंत्र के कारण बंगाल के विभाजन की कुटिल नीति को धक्का पहुँचा था। जनता ने जबरदस्त आन्दोलन किया था। आगे चलकर सावरकर जैसे राष्ट्रवादी नेता, क्रांतिकारियों और सुभाषचन्द्र बोस तक राष्ट्रवाद की इस अन्र्तसलिला को किनारे किया जाता रहा। जिसका उत्स संस्कृति थी। अंग्रेज भारत में राष्ट्रभाव के उदय से सबसे ज्यादा भयभीत थे। लेकिन देश में ऐसे मनीषी मौजूद थे जिन्होंने राष्ट्रवाद की धारा को निरन्तर शक्ति प्रदान की। इस धारा के प्रेरणास्रोत स्वामी विवेकानन्द और महर्षि अरविन्द रहे। यह राष्ट्रवाद सांस्कृतिक पृष्ठभूमि पर आधारित था, न कि पश्चिम की राजनीतिक अवधारणा से।। अंग्रेजों के समय से ही यह बहस चल रही थी कि अंग्रेजों के आगमन से पूर्व भारत एक राष्ट्र था या नहीं। 1905 में महात्मा गांँधी ने ‘हिन्द स्वराजÓ में इस प्रश्न पर विचार व्यक्त करते हुए कहा था ” जिन दूरदर्शी पुरूषों ने सेतुबंध रामेश्वर, जगन्नाथ पुरी और हरिद्वार की यात्रा ठहराई वे मूर्ख नहीं थे। उन्होंने सोचा कि कुदरत ने हिन्दुस्तान को एक देश बनाया है, इसलिये वह एक राष्ट्र होना चाहिये।ÓÓ लेकिन यह लक्ष्य किया जाना चाहिये कि गांँधी के अनुयायी बनने का दंभ भरने वाले कांग्रेस के नेताओं ने संविधान में भारत को एक राष्ट्र घोषित नहीं किया, राज्यों का संघ बताया (नदपवद व िेजंजमे)।
इतिहास के इन पन्नों से गुजरने पर साफ हो जाएगा कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान भी राष्ट्र की अवधारणा के बारे में काफी भ्रम व्याप्त रहा। खासतौर से गांँधीजी के शब्दों में ”जो खुद को सभ्य मानते हैं, उन्हीं के मन में ऐसा भ्रम पैदा हुआ कि हिन्दुस्तान में हम अलग अलग राष्ट्र है।ÓÓ इस सभ्यतागत विमर्श को कम्युनिस्ट विचारों ने लगातार हवा दी। इसकी विस्तृत चर्चा इस समय अप्रासंगिक होगी। इस समय इतना संकेत कर देना ही पर्याप्त होगा कि स्वतंत्रता के बाद देश के शिक्षा संस्थानों में वामपंथियों ने कब्जा कर इतिहास सहित अनेक विषयों में भ्रान्तिपूर्ण पाठ्यक्रम लागू कराये। पहली बार जब अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व में डॉ. मुरलीमनोहर जोशी ने पाठ्यक्रम में और इतिहास में बदलाव की कोशिश की तो कांग्रेस और विपक्षी नेताओं ने ‘शिक्षा के भगवाकरणÓ की बात जोर शोर से प्रचारित की। इससे सिद्ध होता है कि गुलामी की कितनी गहरी जड़ें देश में मौजूद है। वे नहीं चाहते कि देश में राष्ट्रबोध जाग्रत करने का कोई प्रयास हो।
भाषा के संबंध में भी कांग्रेस नेताओं में मतभेद व्याप्त रहा। इसीलिये राजर्षि पुरूषोश्रमदास टंडन, सेठ गोविंददास, बालकृष्ण शर्मा नवीन जैसे नेताओं को हाशिए में डालने के लिए सुविचारित योजना बनाई गई। यह आश्चर्य की बात है कि संविधान में भारत के साथ इंडिया जोडऩे और राजभाषा हिन्दी के साथ अंग्रेजी को कायम रखने की जरूरत क्यों समझी गई ? इसका तार्किक आधार बनाने के लिये ही स्वतंत्रता के कुछ ही वर्षों पूर्व ‘राष्ट्रीयÓ के स्थान पर ‘अन्तर्राष्ट्रीयÓ शब्द प्रचारित हुआ था। यह जानना दिलचस्प है कि मजहबी दृष्टिकोण के प्रचार की दृष्टि से ईसाईयत और इस्लाम के विचार और साम्यवाद के ‘दुनिया के मजदूरों एक हो जाओÓ नारे के राजनीतिक विचार इस ‘अन्तर्राष्ट्रीयÓ धारणा को अपने अनुकूल मान रहे थे। वसुधैव कुटुंबकमÓ की भारत की प्राचीन अवधारणा से कितनी भिन्न ‘अन्तर्राष्ट्रीयतावादÓ की कल्पना थी। पूंँजीवादी देशों ने इसे ‘ग्लोबलाइजेशनÓ के आर्थिक पहलू को बढ़ाने में सहायक मानकर इसके प्रचार में पूरी शक्ति झोंक दी। भारत के तथकथित बुद्धिजीवियों को देश में सांस्कृतिक जागरण को लांछित करने के लिये एक हथियार मिल गया।
इस वैचारिक भ्रान्ति पर हिन्दी के प्रसिद्ध लेखक स्व. निर्मल वर्मा की टिप्पणी महत्वपूर्ण है- ”अंग्रेज शासक जिसे जातियों का बिखराव मानते थे, वह अपने में एक भ्रम था-क्योंकि वे इस तथाकथित बिखराव के पीछे उस संस्कृति के अन्तर्निहित स्मृति-संकेतों को नहीं देख सकते थे जो भारतीय सभ्यता को, उसकी समूची राजनीतिक विश्रंखलता के बावजूद, एक सूत्रता प्रदान करते थे ? एक पराए अजनबी को किसी शहर के वासी हमेशा एक भीड़ दिखाई देते हैं, उस भीड़ की लय और अन्तर्धारा का रहस्य सिर्फ उस नगर का वासी ही जानता है। अंग्रेजी शासक एक ऐसी सभ्यता से आए थे जो यूरोप की राष्ट्रीय सीमाओं में विभाजित हो चुकी थी……..इसीलिए भारत की सभ्यता उनके लिए पहेली बनी रही जो बाहर से अलग अलग मतों, संप्रदायों और जातियों में विभाजित होने के बावजूद-अपने भीतर की समग्रता में अखंडित थी। निर्मलजी के इस विश्लेषण को समझने के बाद यह समझना आसान हो जायगा कि भारत की आत्म छवि को खंडित करने के प्रयास में ही राष्ट्र-बोध के पुनर्जागरण का विरोध हर कदम पर किया जाता रहा है। यह बात भी समझ लेनी चाहिए कि इस वैचारिकता की जड़ें कहाँ हैं? इसलिये जरूरी है कि हम वर्तमान में दिखाई दे रहे राजनीतिक वितंडावाद को सही प्ररिप्रेक्ष्य में समझें। यह मात्र राजनीतिक संकट नहीं है। भारत के समक्ष बड़ा सांस्कृतिक संकट है। इस संकट का सामना करते हुए भारत को अपनी आत्मछवि को सही अर्थों में तलाशना होगा।
(इस सांस्कृतिक संकट के दुष्प्रभावों को अधिक गहराई से समझने के लिए सन् 1998 से बदलते राजनीतिक परिवेश का विश्लेषण इसी क्रम में आगे निरंतर…) (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। )

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