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कोरोना का हॉट स्पॉट बना किसान आंदोलन

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गगन चौकसे
अगर भीड़ उत्पात मचाये, खालिस्तानी झंडा फहराए, फिर उसी आंदोलन के तम्बू में बलात्कार की खबरे आये तो आप इसे आंदोलन कहेंगे क्या? अब ये आंदोलन एक और बड़े खतरे को अंजाम दे रहा है जिसे कोरोनॉ हॉटस्पॉट कह सकते है। किसान के नाम पर आंखों में धूल झोंकने के साथ ही अब किसान आंदोलन मासूम लोगो की जिंदगी को भी झोंक रहा है। स्वार्थ की परिकाष्ठा देखिए कि किसान आंदोलन, किसान सोशल आर्मी और ‘नामचीनÓ चेहरे अब देश के सामने एक्सपोज होने के बाद भी बेशर्मी से अड़े हुए है और नाजायज मांगो के साथ खड़े हुए है। विपक्ष समय समय पर इस फ्लॉप हुई ‘बासी कढ़ीÓ में उबाल लाने की कोशिशें करता रहा है वरना बात कबसे खत्म हो जाती। किसान आंदोलन में अब तक जो हुआ वो असंवेदनशील, असंवैधानिक और आसामाजिक ही रहा। इसकी पृष्ठभूमि अब देश के लिए ‘कष्टभूमिÓ बन चुकी है क्योंकि अब खुलेआम आंदोलन कर्ता की भीड़ पुलिस को मारती है, धमकी देती है, हिंसा करती है, बंगाल से लड़की लाकर बलात्कार करती है। अब इस भीड़ में शामिल लोगों की भीड़ के कारण कोरोना से मृत्यु भी हो रही है मगर आंदोलन के आयोजक और प्रायोजक मान ही नही रहे जबकि आंदोलन सिर्फ इनके तंबू तक सीमित रह गया है। देश का 60त्न किसान तो इस फर्जी आंदोलन का नाम तक नही जानता है।
आंदोलन के आपराधिक मामले रफा दफा सफा : इस आपराधिक आंदोलन में अब तक जो ‘कारनामेÓ हुए है उन्हें पुलिस प्रशासन ने क्यो आड़े हाथ नही लिया ये ताज्जुब की बात है। किसी होटल में अगर जिस्मफरोशी होती है तो उसे सील तक कर दिया जाता है फिर यहां अप्रैल में हुए बलात्कार जिसमें ‘आपÓ के नेता शामिल पाए गए है उसके साथ ही योगेंद्र यादव जो मुस्तैद खिलाड़ी है जिन्होंने उस टेंट को बलात्कार के बाद रातोरात हटवा दिया उनसे सवाल और गिरफ्तारी क्यो नही हो रही है ? क्या किसान को आपराधिक गतिविधियों की छूट है या उसके नेताओ को ? मामला एक रेप का है जो 1 माह पहले हुआ था जिसमें लड़की की मृत्यु तक हो चुकी है मगर एक्शन के नाम पर फाइल्स ही बन रही है। क्या केजरीवाल एक ट्वीट तक न कर सके जो इस आंदोलन के बराबरी के हिस्सेदार थे। जब भीड़ एक आदमी को घेर कर मारे तो मोबलीचिंग कहलाती है मगर इकठ्ठा होकर पुलिस को दौड़ा दौड़ा कर मारे तो क्या अपराध नही है ये ? इस आंदोलन की परतें खुलना बांकी है क्योंकि वहाँ दबेपाँव चुपचाप क्या हो रहा है देश बेख़बर है। अब केंद्र सरकार को इस आपराधिक अडड़़े की सीबीआई जांच करनी चाहिए क्योंकि दाल में काला नही दाल ही काली नजर आ रही है।
कोरोना स्प्रेडर बना किसान आंदोलन : जहां सरकार कोरोना की तीसरी लहर के लिए तैयारी कर रही है वही टीम टिकैत कोरोना को खुले मंच से दावत दे रही है। इस पर कानूनी कार्यवाही अब तो जरूरी है । टीम टिकैत बिना रोक टोक देश भर के गांवों से भीड़ जुटाने में लगी है ताकि ये आंदोलन जीवित रह सके और इनकी ‘जीविकाÓ भी।
कुंडली और टीकरी बार्डर हाट स्पाट बने हुए हैं। कुंडली बार्डर पर लगातार दूसरे दिन एक प्रदर्शनकारी की मौत हो गई। विगत बुधवार सुबह लुधियाना के गांव फूलांवाला निवासी आंदोलनकारी महेंद्र सिंह की संदिग्ध परिस्थिति में मौत हुई । इस मौत को भी इनकैश बलिदान कहकर किया गया। हालांकि अभी उनकी कोरोना जांच रिपोर्ट का इंतजार है। इससे पहले मंगलवार देर शाम धरनास्थल पर टेंट में मृत मिले पटियाला के गांव के बलबीर की कोरोना जांच रिपोर्ट ही पाजिटिव आई है। आंदोलन स्थल पर बने अस्पताल में रोजाना होने वाले ओपीडी में 80 प्रतिशत बुखार व कोरोना के अन्य सिम्टम वाली मरीज होते हैं। बड़ी संख्या में कोरोना के संदिग्ध मरीजों को क्या ऐसे हाल में रखना चाहिये ये कानून और व्यवस्था पर भी प्रश्नचिन्ह है। देश में जहां गरीब लॉकडाउन के कारण आजीविका तक नही चला पा रहा है तो ये फर्जी आंदोलन कोरोना का हॉटस्पॉट क्यो बने हुए है और कब तक ये आपदा केंद्र बने रहेंगे। किसान आंदोलन कर्ता पहले वैक्सीन पर फिर जांच के विरोध में भी खड़े दिखाई दिए है कुल मिलाकर गलती उन संरक्षण दाताओ की है जिनकी पनाह में देश के लिए बबूल का पेड़ ही साबित हुआ ये आंदोलन जिसकी राह पर निकलने वाला लहूलुहान ही हुआ है। टिकैत ने साफ किया कि वे बढ़ते कोरोना के मामलों के बाद भी पीछे नही हटेंगे। कोरोना की गाइडलाइंन के बावजूद आंदोलन खत्म नहीं होने देंगे, ये दिल्ली पंजाब और देश के लिए खतरा बढ़ाने वाली बात है क्योंकि जिस कैम्प में बलात्कार की खबरे हो , हिंसा आम हो वहां अनुशासन की बात करना एक भद्दा मजाक ही होगा। सरकार कढ़े फैसले न ले इसलिए कोरोना की खबरे दबा के दबाई जा रही है।
केजरीवाल क्यो चुप ? इस पूरे घटनाक्रम पर केजरीवाल चुप है जबकि तम्बू दिल्ली सरकार की छांव में ही लगे थे। इनकी मौजूदगी में ये देशव्यापी आंदोलन फला फूला अब टिकैत की सांसे फूल रही है। जब सरकारी तंत्र इसे सुपर स्प्रेडर कह रहा था तो टीम केजरीवाल और फर्जी किसान आर्मी अपने हक की लड़ाई बता रहे थे। जब नीति गलत हो तो परिणाम सही नही आ सकते। इस आंदोलन का मकसद किसान कभी था ही नही सिर्फ गांव गांव तक भ्रम फैलाना था ।

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