Home लेख केंद्र की तर्ज पर होगा राज्य का बजट?

केंद्र की तर्ज पर होगा राज्य का बजट?

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प्रो. जी . एल. पुणताम्बेकर
वर्षों से बजट को देखने की हमारी दृष्टि में कोई बड़ा बदलाव नही आया है जबकि इस बीच वैचारिक और आर्थिक धरातल पर देश दुनिया में आमूलचूल परिवर्तन हुआ है । वास्तव में अब पूंजीवादी रास्ते से समाजवादी लाभ देने का युग आरम्भ हुआ है। और यदि यह कहा जाए कि इसे केंद्र की मोदी सरकार ने प्रारंभ कर दिया है तो यह मेरे लिहाज़ से गलत नही है। इसका आशय यह है कि एक तरफ कमजोर तबके को प्रत्यक्ष और सीधे लाभ देने की अनेक सफल योजनाओं का संचालन हो और दूसरी और निजी क्षेत्र को सक्षम और गतिमान बनाकर कर आर्थिक संसाधन जुटाने की कवायद की जाए। केंद्र सरकार के बजट में यह झलक साफ़ दिखी और इसके बाद इसकी कितनी और कैसी झलक मध्यप्रदेश के बजट में दिखती है, यही विचारणीय है। यद्यपि केंद्र और प्रदेश की स्थितियों में कुछ बुनियादी अंतर हैं और उसका असर प्रदेश के बजट पर भी होगा, पर इस सबके बाद भी यह बजट केंद्र के अभियानों को मजबूत करने पर केन्द्रित होने की अधिक आशा है।
कोरोना संकट से अर्थयवस्था को हुए नुकसान, स्वास्थ्य क्षेत्र में अधिक निवेश की मजबूरी और पूंजीगत व्यय के लिए संसाधनों की कमी जैसे कुछ ऐसे मुद्दे हैं जिनसे सभी राज्य प्रभावित हैं और इसका असर बजट पर होगा ही। यह भी सत्य है कि केंद्र और राज्य सरकारों को इस कारण से अपने राजकोषीय संतुलन को तय सीमा से अधिक बिगडऩे देने की सहूलियत भी मिली और यह प्रदेश सरकार के पास भी है। इसके बाद भी प्रदेश सरकार के कर्ज की स्थिति एक खतरे की घंटी है। प्रदेश सरकार लगभग 2 लाख करोड़ रुपये के कर्ज में है जो कि आने वाले बजट का लगभग 90 प्रतिशत होगा। इस स्थिति को नियंत्रण में रखने के लिए राजस्व बढ़ाना, फिज़़ूल के खर्चों पर लगाम लगाना, राजस्व व्यय की तुलना में पूंजीगत व्यय बढ़ाना, यथासंभव खैराती योजनाओं से बचना और सबसे अहम् अर्थात सरकारी खर्चों की गुणवत्ता बढ़ाना (यानी भ्रष्टाचार पर लगाम) ही कारगर उपाय है। जहाँ तक राजस्व का प्रश्न है, इस वर्ष कोरोना संकट के कारण जनवरी, 2021 तक विभिन्न प्रमुख स्रोतों से लगभग 26170 करोड़ रुपये का कर राजस्व ही एकत्र हो सका परन्तु लॉकडाउन के बाद अर्थव्यवस्था का व्ही शेप रिकवरी से आगामी वर्ष में कर संग्रह लक्ष्य तक पहुंचेगा, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए। चिंताजनक यह है कि प्रदेश में अप्रत्यक्ष कर के मुख्य स्रोत जीएसटी में इनपुट क्रेडिट के सैकड़ों करोड़ के जो घोटाले उजागर हुए हैं, जिससे जाहिर है कि नई व्यवस्था में भी चूना लगाना संभव है। हाल में एक विधायक के यहाँ आयकर छापे में 450 करोड़ की संपत्ति जप्त होना संकट की गंभीरता को बताता है। यह केैंंसर हर पार्टी में है और इसका इलाज एलियन नैस की पुस्तक द अनटचेबल में है जो 19वीं शताब्दी में शिकागो में माफिया और भ्रष्टाचार के गठजोड़ को तोडऩे की सत्य घटना पर आधारित है। इसका मुख्य सन्देश है कि ये बुराइयाँ किसी कानून से दूर नही हो सकतीं। सभी तरह के अपराधों की वजह है कि वे लाभ का धंधा हैं। उन्हें हानि में बदल दीजिये, वे स्वत: समाप्त हो जायेंगे। भूमाफियाओं पर कार्यवाही चलती रही तो इस धंधे को हानि में बदलेगी और इसका सीधा असर सरकार के राजस्व पर पड़ेगा। क्या ऐसा नही हो सकता कि पकड़ी गई कर चोरी और आय से अधिक संपत्ति के मामलों पर त्वरित कार्यवाही होकर उसे भी प्रदेश के बजट की आय का हिस्सा बनाया जाए? इस प्रयोग का मनोवैज्ञानिक असर अधिक होगा और कर अपवंचन पर अंकुश लगेगा। राजस्व के छिद्रों को बंद करने की यह मुिहम ही सरकार को पेट्रोल और डीज़ल जैसे उत्पादों पर भारी कर लगाने की मजबूरी से छुटकारा दिलायेगी। । आंकड़े देखे तो वर्ष 2019 -20 में सरकार ने पेट्रोल से 4189 करोड़ और डीज़ल से 5636 करोड़ रुपये कमाए परन्तु इन उत्पादों पर प्रदेश का कर पड़ोसी राज्यों से भी अधिक है। इस पर रियायत राहतकारी होगी जिसकी भरपाई शराब को महंगा कर की जा सकती है क्योंकि शराब की खपत (21 प्रतिशत) की तुलना में राजस्व कम (19 प्रति) ही बढ़ा है। ऐसी खबर है कि बजट में केंद्र के समान 4000 रुपये प्रतिवर्ष अतिरिक्त किसान सम्मान निधि देने की घोषणा हो सकती है। इस लोकलुभावन प्रस्ताव के स्थान पर पेट्रोल डीज़ल पर अधिकाधिक राहत देना अधिक प्रभावी होगा। आय बढऩे के लिए केंद्र के सामान सार्वजनिक संपत्तियों का स्ट्रेटजिक विनिवेश भी बजट का भाग हो सकता है। यदि ऐसा हुआ तो यह पूंजीवाद के रास्ते समाजवाद लाने वाला ही होगा। कर्मचारियों के लिए उनकी रोकी गई वेतन वृद्धि और महंगाई भत्ते को देने का दबाव भी होगा परन्तु इसके साथ यदि खाली पड़े लगभग 90 हजार पदों को भरा जाए तो यह प्रदेश के 35 लाख बेरोजगारों के लिए बड़ी राहत होगी।
(लेखक आर्थिक विश्लेषक हैं।)

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