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ओलंपिक के बाद क्या खेल खतम-पैसा हजम

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  • जीत के तात्कालिक उत्सव मनाने से आगे जाकर खेल संस्कृति के निर्माण की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे

ओलंपिक के इतिहास में देश ने पहली बार सात पदक जीतकर अपने अग्रगामी होने का परिचय दिया। इनमें से कई प्रतिस्पर्धाओं में हमने सदियों के बाद कोई उपलब्धि हासिल की। इसलिए हमारी शक्ति व कौशल को दाद देने का अवसर बनता है। लेकिन क्या यह तात्कालिक खुशी है और कौशल का फौरी प्रदर्शन है या यह गति आगे और तेज होकर भारत को किसी ज्यादा प्रतिष्ठित मुकाम पर ले जा सकती है, यह विचार का प्रश्न है।

शिवकुमार विवेक, वरिष्ठ पत्रकार
shivkumar.vivek @ gmail.com


खेल खतम पैसा हजम। यह कहावत आधी सही है, आधी पर बहस की जा सकती है। भारत में यह बहस जरूरी है। फिलहाल तो सत्रह दिन का वैश्विक खेल मेला भारतीयों के लिए खुशफहमी के साथ खत्म हो गया। ओलंपिक के इतिहास में देश ने पहली बार सात पदक जीतकर अपने अग्रगामी होने का परिचय दिया। इनमें से कई प्रतिस्पर्धाओं में हमने सदियों के बाद कोई उपलब्धि हासिल की। इसलिए हमारी शक्ति व कौशल को दाद देने का अवसर बनता है। लेकिन क्या यह तात्कालिक प्रतिक्रिया और कौशल का फौरी प्रदर्शन है या यह गति आगे और तेज होकर भारत को किसी ज्यादा प्रतिष्ठित मुकाम पर ले जा सकती है, यह विचार का प्रश्न है।

ओलंपिक दुनिया का सबसे प्राचीन और विशाल खेल समारोह है। जो व्यवस्थित रूप से ग्रीक के ओलंपिया में ईसा पूर्व 776 में प्रारंभ हुआ था। यह महज एक समारोह के रूप में शुरू नहीं हुआ बल्कि एक खेल आंदोलन या खेल पर्यावरण का हिस्सा था। यूनान ने इस पर्यावरण को प्रस्थापित किया था। बाद में इसमें वैश्विक भागीदारी शुरु हुई और हाल के ओलंपिक में दो सौ से ज्यादा देशों ने हिस्सा लिया है। इनमें सबसे ज्यादा 113 पदक जीतकर अमेरिका सबसे आगे रहा तो चीन दूसरे क्रम पर रहा। तीसरे पर जापान है। भारत इसमें 48वें क्रम पर है।

देखने में यह बहुत नीचे का क्रम है क्योंकि हमसे ऊपर दुनिया के 47 देश हैं। खेलों की दुनिया में हमारा इतनी पीछे रहना आम आदमी को इसलिए अचरज में डालता है क्योंकि हम दुनिया में छठवीं बड़ी अर्थव्यवस्था होने का दावा करते हैं और प्राचीन काल से अपने को विश्वगुरु कहलाने में गर्व का अनुभव करते हैं। खेलों में हम इतना पीछे क्यों हैं, जबकि खेल हमारे जीवन का हिस्सा रहे हैं। खेलों के माध्यम से हमारे गुरु जीवन की शिक्षा देते रहे हैं। क्या खेल को हमने जीवन में अन्य लोगों से कम महत्व दिया या हमारी मेधा और सामर्थ्य कहीं खो गई या चुक गई? खेलों से होने वाले वैयक्तिक लाभ की बात को छोड़ भी दें और मान लें कि अब खेल भी राष्ट्रिकता को प्रदर्शित करने का माध्यम हैं या खेल प्रतिस्पर्धाओं के जरिये भी हम अपनी सामर्थ्य को दिखाते हैं तो क्या खेलों पर हमें ज्यादा ध्यान देने का वक्त आ चुका है? इस पर गंभीर मंथन की जरूरत है।

थोड़ा सा मंथन ओलंपिक जैसी खेल स्पर्धाओं के समय होता है। यह मंथन फौरी समीक्षा की तरह होता है। इनके गुजर जाने के बाद हम अपनी पुरानी दुनिया में लौट आते हैं जिसमें खेल दोयम दर्जे की जगह रखते हैं और सरकार या संस्थाएं इसे दीगर प्रशासनिक प्रक्रियाओं की तरह चलाने लगती हैं। ओलंपिक का जुनून कितना फौरी होता है, यह बताने की जरूरत नहीं है, हर ओलंपिक के बाद देश ने इसका अनुभव किया है।

खेलों की भारतीय वैयक्तिक जीवन में जगह रही है और कई खेल जिनके लिए किसी साधन-संसाधन की भी जरूरत नहीं होती थी, गांव-गांव और मोहल्ले-मोहल्ले में खेले जाते रहे हैं। धनुर्विद्या, मल्लयुद्ध, घुड़सवारी, नौका संचालन, ऊंची कूद, लंबी कूद, दौड़, कबड्डी जैसे खेलों में अतीत में एक से एक हुनरबाज देश में पैदा हुए। बड़े-बड़े युद्धों की कहानियां इसी कौशल पर आधारित हैं। सफलता है तो असफलता भी इसी हुनर में पिछडऩे के इर्द-गिर्द बुनी हुई है। जैसे पश्चिम एशिया की तरफ से आने वाले आक्रांताओं की जीत उनकी कुशल घुड़सवारी और घोड़ों के बेहतरीन संचालन से ही संभव हुई थी।

लेकिन अंग्रेजी साम्राज्यवाद ने हमारे खेलों को खत्म करने की कोशिश की। उनके गोल्फ जैसे महंगे और शौकिया खेलों के कारण भारतीय खेलों का महत्व घटा। समाज का नजरिया ऐसा बदला कि घरों में हमारे मां-बाप यह कहने लगे कि ‘पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब, खेलोगे-कूदेगो तो होगे खराब।’ मैकाले की शिक्षा प्रणाली ने भारतीयों में बाबू बनाने का रुझान पैदा किया। जैसा ओलंपिक खेलों का महान आयोजन है, वैसे देश में देसी खेलों के महत्तर आयोजन हमारे लिए सपने की तरह होते हैं। ये होते हैं, तो उनका हासिल कुछ नहीं होता क्योंकि वे उत्सवधर्मिता में खत्म हो जाते हैं।

अव्वल तो देसी ओलंपिक जैसा कोई आयोजन ही नहीं है। ऐसे में ओलंपिक जैसे खेलों में हमारी प्रभावी उपस्थिति कैसे बढ़े, यह चुनौती है और इससे निपटने की योजनाएं बनकर भाप की तरह उड़ जाती हैं। इन योजनाओं को क्रियान्वित करना ही काफी नहीं, इन्हें इस तरह क्रियान्वित करना होगा जिससे खेल का उत्प्रेरक वातावरण बने। यह वातावरण बनाना और खेल की संस्कृति पैदा करना सबसे बड़ी चुनौती है।

इस संस्कृति के बिना खेल आयोजन मात्र एक रस्म बनकर रह जाएंगे। पढऩे-लिखने से नवाब बनाने की तरह खेलने से नवाब बनाने की संस्कृति लाने की जरूरत है। बहुतेरे अभिभावक मानते रहे हैं कि खेल से न रोजगार मिलेगा और न दो पैसा। बस, पैसे गंवाने का खेल होगा। ओलंपिक के नायकों का जिस तरह महिमागान किया जा रहा है, उसका यही सकारात्मक संदेश है कि खेल में भी प्रतिष्ठा है और पैसा भी कम नहीं। बस कुछ दिन बाद हम यह भावना तिरोहित न हो। हर चौथे साल ओलंपिक के आसपास हमारी तंद्रा टूटती है।

आजकल समाज सरकारों के पीछे चलता है। सरकारें क्या करती हैं ? अगर ओलंपिक के व्यक्तिगत प्रदर्शनों की पड़ताल करें तो ज्यादातर कुछ परिवारों और समाजों की खेल-सोच या खेल-प्रोत्साहन का परिणाम नजर आते हैं। यह उन समाजों में है जिन्होंने खेल की संस्कृति विकसित की है। ज्यादातर पदक जीतकर लाते हैं पंजाब व हरियाणा के (अब उत्तर-पूर्व भी) या दक्षिण के कुछ क्षेत्रों के लड़के-लड़कियां। शेष भारत लगभग तमाशबीन है। हरियाणा में खेल की प्रतिष्ठा हुई है।

गांव-गांव में हमारे यहां जिस तरह भजन मंडलियां पैदा होती हैं, वहां कु्श्ती के अखाड़े बनते हैं। दिल्ली की अकादमी में प्रशिक्षण लेने के लिए गए बेटों को घर की भैंस का ताजा व शुद्ध दूध पिलाने के लिए रोज सुबह पिता हरियाणा के गांवों से राजधानी तक मोटरसाइकलें दौड़ाते दिखते हैं। पंजाब भी साधनसंपन्नता से शारीरिक क्षमता निर्माण का मेल करके अच्छे परिणाम देता है। दूसरी तरफ, दक्षिण का मामला देखें तो वहां प्रशासन और सरकार खेलों के पीछे खड़ी नजर आती है। देश के परिदृश्य में ये दोनों चीजें अनुपस्थित दिखती हैं। तो क्या ताजा ओलंपिक की विजय-भावना इन दोनों के लिए माहौल और मानसिकता पैदा करेंगे, यह हम पिछले सालों की तरह एक बार फिर देखने के लिए तैयार हैं।

उपराष्ट्रपति एम वैंकैया नायडू ने कल ही अपने एक लेख में कहा है कि ‘ओलंपिक ने हमारे भविष्य के मिशन को परिभाषित किया है। भारत सरकार ने वर्ष 2015 से खेल प्रतिभाओं को पहचानने और प्रोत्साहित करने पर बल दिया है जिसके परिणाम टोक्यो ओलंपिक में आए। यह मिशन देश में खेल की संस्कृति को बढ़ावा देकर ही कामयाब हो सकता है। हमारे भविष्य के सितारों को जरूरी वैज्ञानिक और व्यावसायिक सहायता देकर इसे हासिल किया जा सकता है।’

सवाल है कि भविष्य की प्रतिभाओं को कैसे पहचानें और उन्हें बढ़ावा देने की संस्कृति कैसे लाएं? क्या हमने अब तक खेलों के ऐसे आयोजनों का संजाल बुना जिनसे प्रतिभाओं की पहचान हो? उनको तराशने और उनका भविष्य खेलों में निवेश करने के लिए सक्षम और क्रियाशील संस्थाएं खड़ी कीं और आर्थिक व संसाधनों का टोटा खत्म करने की दिशा में कोई ठोस उपाय किए? अव्वल तो किसी से पूछ लीजिए, देसी स्थानीय ओलंपिकों का कोई नाम ही नहीं बता सकेगा। उसके बाद बड़े खेल आयोजनों में प्रतिभा दिखाने वाले सितारें कहां गुम हो जाते हैं, इसकी सुधि लेने वाला कोई नहीं। जिन खेलों को हम पारिवारिक माहौल और संस्कारों में स्वाभाविक तरीके से सीखते हैं-जानते हैं, उनमें भी हमारी दुनिया में धाक बनाने की परवाह हमने नहीं की। आज ओलंपिक में वही खेल अधिकतर हमें आगे रख रहे हैं।

हम क्रिकेट के पीछे दीवाने होकर दौड़ते हैं। गांव-गांव, शहर-शहर के खेल मैदानों में उसके मुकाबले दिखाई देते हैं, उसके सितारों के पीछे पागल रहते हैं। और यही एकमात्र खेल होता है जिसके लगातार और लगातार आयोजन होते रहते हैं। इसके फलस्वरूप इस खेल में अच्छे खिलाड़ी निकलते भी हैं किंतु अन्य खेलों की उपेक्षा होती है। जो एथलेटिक्स हमारे जीवन का हिस्सा रहे हैं, उनमें नीरज चौपड़ा पहली बार स्वर्ण लेकर आए। हमने अपने राष्ट्रीय खेल हॉकी को खत्म होने दिया।

इस खेल में भारत को चालीस साल बाद कांस्य पदक मिला। भोपाल ही किसी जमाने में हॉकी की नर्सरी के रूप में मप्र में विख्यात हो चुका था। उसका हश्र हम जानते हैं। बंगाल ने फुटबाल को बचाकर रखा है। फुटबाल को बंगाल ही बचाए हुए है। तो क्या यह ओलंपिक तात्कालिक खुशफहमी, प्रवचनों-उपदेशों और कसमों-वादों-इरादों-आश्वासनों से आगे जाएगा और क्या अगले ओलंपिक के लिए तीनसाल मास्टर प्लान या एक्शन प्लान बनाकर काम किया जाएगा-यह देखा जाना है। यानी ‘खेल खतम-पैसा हजम’ होगा कि नही?

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