अकादमिक स्वतंत्रता की आड़ में अपने ही देश के खिलाफ युद्ध

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हैदराबाद के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस में एक शोधपत्र में भारतीय नीति के विरुद्ध विचार व्यक्त किए गए हैं। इसमें कश्मीर को लेकर गलत तथ्य रखे गए हैं जो भारत विरोधियों के दुष्प्रचार का हिस्सा रहे हैं।

डॉ. समन्वय नंद

हैदराबाद स्थित टाटा इंस्टीट्यूट आफ सोशल साइंसेस (टिस) की एक छात्रा का शोधपत्र इन दिनों विवादों में हैं । इसके शीर्षक पर दृष्टि ‘एंजेंडरिंग कनफ्लिक्ट अंडरस्टैंडिग द इंपैक्ट आफ मिलिटाराइजेशन, कनफ्लिक्ट एंड पैंडेमिक- इंड्युस्ड लॉकडाउन आन डोमेस्टिक वायोलैंस इन इंडिया आकुपायेड कश्मीर ।’ इस शोध पत्र के शीर्षक में ‘कश्मीर’ को ‘भारत अधिकृत कश्मीर’ के रुप में उल्लेख किया गया है । इस शोध पत्र का शीर्षक तो चौकाने वाला है ही लेकिन इसमेंजो लिखा गया है और उसके बारे में जो जानकारियां मिल रही हैं,वह और भी चौकाने वाली हैं । इस शोध पत्र में स्वतंत्रता के बाद जम्मू कश्मीर में किये गये हमले को ‘स्वतत्रता संग्राम’ बताया गया है । इसमें कहा गया है कि जम्मू कश्मीर में स्वतंत्रता संग्राम में स्वतंत्रता सेनानियों को पाकिस्तान का सहयोग प्राप्त हुआ और वे पाकिस्तान के सहयोग से महाराजा हरिसिंह को हटाना चाहते थे।

इस शोध पत्र में एक और बात लिखी गयी है ,जिसका उल्लेख करना यहां आवश्यक होगा। पाकिस्तानी कब्जे वाले कश्मीर को जहां भारत पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर बोलता है वहीं इस शोध पत्र में इसे आजाद कश्मीर बताया गया है। ।वैसे देखा जाए तो ‘कश्मीर’ को ‘भारत अधिकृत कश्मीर’ लिखना भारत के खिलाफ एक तरह से युद्ध छेडऩा है । क्योंकि पाकिस्तान व विदेश की भारत विरोधी शक्तियां ‘कश्मीर’ को ‘भारत अधिकृत कश्मीर’ के रुप में लिखते हैं व इसे प्रचारित करने में लगे रहते हैं । इसलिए एक तरह से यह पाकिस्तान व भारत विरोधी शक्तियों की भाषा है तथा भारत के खिलाफ युद्ध है।

इस शोध पत्र के सामने आने के बाद सवाल पैदा होता है कि क्या अकादमिक कार्य व अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर कुछ भी लिखने की अनुमति दी जा सकती है ? इसे अकादमिक कार्य के नाम पर कतई अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। क्योंकि अभी भी कुछ पश्चिमी मीडिया इसी शब्द को लिखते हैं और ऐसा कर वे एक भारत विरोधी नैरेटिव तैयार करने के प्रयास में रहते हैं।

यदि भारत के अकादमिक जगत में इस तरह के लिखने की अनुमति प्रदान की जाती है तो कल भारत का मीडिया भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर इस शब्द का प्रचलन धडल्ले से शुरु कर सकता है । इसके बाद आगे की स्थिति क्या होगी। इससे हम भलीभांति परिचित हैं। इसलिए इस बात को गंभीरता से लेने की आवश्यकता है । इस मामले में केवल शीर्षक में ही समस्या नहीं है। इसके अंदर जो चीजें लिखी गई है वह विशुद्ध रुप से भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार है तथा भारत के खिलाफ सूचना वारफेयर का हिस्सा है।

यह सारी बातें अकादमिक स्वतंत्रता के नाम पर की जा रहीं है । इसलिए इस दृष्टिकोण से मामले की एनआईए व खुफिया एजेंसियों से भी पूर्ण रुप से जांच किये जाने की आवश्यकता है । देखा जाए तो यह विवाद अकादमिक स्वतंत्रता का नहीं है । कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है, यह तथ्य है। यदि कोई निजी व्यक्ति या कोई सरकारी संस्थान इसके विपरीत सोचता है तो यह माना जाना चाहिए कि वह देश के खिलाफ सवाल खड़ा कर रहा है और कोई भी देश इसे सहन नहीं करेगा ।

यह मामला सामने आने के बाद किस ढंग से शिक्षण संस्थान अकादमिक कार्य के बहाने देश के खिलाफ युद्ध छेडने के कार्य में लगे हैं इसका एक ताजा उदाहरण सामने आया है । इस मामले को लेकर अब केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय व गृह मंत्रालय को गंभीरता से आवश्यक कार्रवाई करनी चाहिए। यह विवाद सामने आने के बाद जब संस्थान के खिलाफ कार्रवाई करने की बात की गई तो संस्थान द्वारा इससे पीछा छुडाने के लिए एक बयान दिया गया है । संस्थान ने बयान जारी कर कहा है कि टिस के छात्र के मास्टर्स डिसर्टेशन के संबंध में सोशल मीडिया में आये संदर्भ पर हम स्पष्ट करते हैं कि संस्थान इस शीर्षक का समर्थन नहीं करता ।

तथ्यों की खोज के लिए आवश्यक कार्रवाई की जा रही है। टीस संस्थान द्वारा इससे बचने के लिए तर्क दिया गया है उसे स्वीकार कर पाना संभव नहीं है । क्योंकि किसी भी प्रकार के शोध के शीर्षक पर संस्थान के वरिष्ठ लोगों की बैठक होती है । इसमें निर्णय के पश्चात ही शीर्षक दिया जाता है । ऐसे में संस्थान द्वारा दिया गया तर्क हास्यास्पद ही नहीं देश के प्रति द्रोह है। ऐसे शिक्षक के खिलाफ करवाई होनी चाहिए।

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