Home अमृत कलश निंदा न करने का व्रत

निंदा न करने का व्रत

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बहुत पहले मैं पश्चिमी देशों में गया और वहां एक बड़े दार्शनिक से भेंट हुई। उन्होंने मुझसे पूछा-परदेश में आकर कैसा लग रहा है। मैंने कहा कि पश्चिम का जो चिंतन है, दृष्टिकोण है, सोच है वह पूरे विश्व को बाजार मानता है, यह समझ आ रहा है जबकि हमारे ऋषि-मुनियों ने वसुधैव कुटुंबकम अर्थात पूरा विश्व एक परिवार और उससे आगे कुटुंब है, कहा। कुटुंब में हर इकाई एक-दूसरे के लिए जीती है, दूसरे के हित के लिए अर्पण करना होता है।

परिवार में स्वयं की भले ही हानि हो जाए, दूसरे के लाभ और सम्मान की चिंता करते हैं। व्यक्ति परिवार की एक इकाई है। यदि एक इकाई ठीक हो गई तो पूरा समूह ठीक होता है। व्यक्ति का सही होना कुछ व्रतों से तय होता है। संयम व्रत, आनंद व्रत, अस्वाद व्रत जैसे कई व्रतों को निभाना होता है। अस्वाद व्रत भारत का सबसे बड़ा व्रत है।

एक बार भोजन बन गया, भगवान को समर्पित हो गया तो उसे उसी रूप में लेंगे। उसमें ऊपर से नमक, मिर्च-मसाला नहीं मिलाएंगे अब तो थाल गया ठाकुर को। वह प्रसाद है। एक और व्रत है अनिंदा व्रत। हम दिन-रात निंदा में लगे रहते हैं-आजकल देश बेकार हो गया। निराशा, अवसाद, भय फैलाते हैं। यह देश इतना निंदनीय नहीं है। यदि हम जातियों की, धर्म की, समुदाय की, राष्ट्र की निंदा करेंगे तो क्या सचमुच अपनी निंदा नहीं कर रहे हैं। क्या इतनी निंदनीय है हमारी जातियां, प्रथाएं, व्यवस्थाएं।

निंदा से निराशा होती है, निराशा जब आती है, जब निंदा आती है और निंदा तब आती है जब अश्रद्धा होती है। श्रद्धा में निंदा नहीं आ सकती। जैसे ही आप श्रद्धास्पद होते हैं और आपके जीवन में श्रद्धा आती है, निंदा चली जाती है। निंदा के साथ अकर्मण्यता आती है। अकर्मण्यता में लक्ष्य से पलायन आता है। उसके बाद प्रमाद, जड़ता और उत्पादन शून्यता आती है। इसलिए एक व्रत अपनाइए -अनिंदा का। सद्गुण का, दूसरों की श्रेष्ठता को स्वीकारने का, दोष दर्शन के अभाव का, प्रियता का व्रत।

-स्वामी अवधेशानंद

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