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अकारण का भेद

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एक तरफ वे लोग जो अपने को धार्मिक कहते हैंं, अपने आपको अपने धर्म मंदिर की चारदीवारी के अंदर कैद किए रहते हैं और न केवल उससे बाहर आने से ही इनकार करते हैं (ऐसा करने का उनका अधिकार है), अपितु यदि उसका बस चले तो वह उस चारदीवारी से बाहर रहने वालों को जीवित रहने के अधिकार से ही वंचित कर दें।

दूसरी तरफ तर्कवादी स्वतंत्र विचारक लोग, जिनके अंदर किसी प्रकार की धार्मिक भावना का एक प्रकार से सर्वथा अभाव है (जिसका कि उन्हें अधिकार है) धार्मिक आत्माओं के विरुद्ध लडऩा ही अपने जीवन का मुख्य व पवित्र लक्ष्य समझते हैं और उन्हें जीवित नहीं रहने देना चाहते। वह यह नहीं देख पाते कि वह जिस वस्तु पर आक्रमण कर रहे हैं, जिसे कि वह समझ नहीं पाते।

उन ऐतिहासिक व तथाकथित ऐतिहासिक पुस्तकों के आधार पर जो कि बहुत काल गुजर जाने के कारण सर्वथा निर्वीर्य हो चुकी हैं और जिनके ऊपर काल की काई जम चुकी है। धर्म की आलोचना करना उसी प्रकार निरर्थक है जिस प्रकार की शारीरिक अवयवों के छेदन से जिनके द्वारा मानसिक क्रियाएं प्रभावित होती हैं, आंतरिक मानसिक तथ्यों की व्याख्या असंभव है।

मेरा ख्याल है कि जिस प्रकार प्राचीन समय में प्राय: सभी धर्मों ने जादू शक्ति और उसको अभिव्यक्त करने वाले शब्द अक्षर व वर्णों को एक समझकर एक प्रकार की भूल कीै, उसी प्रकार आजकल के युक्तिवादियों ने विचार शक्ति और अभिव्यक्ति में भेद न करके भ्रम को जन्म दिया है।

– रोम्यां रोला

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