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जीवन के दो तोते

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उपनिषद में दो तोतों का वर्णन आता है। एक तोता कभी इस डाल पर जाता है कभी उस डाल पर जाता है। कभी कड़वा फल मिल गया तो चिल्लाता है, कभी मीठा फल मिल गया तो हंसता है। दूसरा तोता केवल देख रहा है, बस कुछ कह नहीं रहा है। पहला तोता जब इस कूटस्थ होते से कहने लगा कि देख मैं तो दूसरे वृक्ष पर जा रहा हूं क्योंकि यहां मीठे फल नहीं है, तो कूटस्थ दूसरे तोते ने कहा-जब तुझे मेरी याद आए तो मैं तुझे कुछ शब्द देता हूं। इन्हें पुकारना तो मैं तुझसे मिल जाऊंगा। तेरे पास आ जाऊंगा क्योंकि हम दोनों मित्र हैं।

ऋषियों ने कितनी सुंदर तरह से आत्मा और परमात्मा का वर्णन किया है। खट्टे मीठे फल खाने वाला तोता आत्मा है। कूटस्थ तोता ही परमात्मा है जो धैर्य से प्रतीक्षा में बैठा है। ठाकुरजी तो कह रहे हैं। मैं तो जीव तेरी प्रतीक्षा में बैठा हूं। यह खट्टे मीठे फल का वृक्ष कभी यह जन्म तो कभी अन्य जन्म ही है। कभी जब आत्मा रूपी तोते भटकते भटकते पहले वृक्ष पर आ गए तो खेद है कि वह उस संकेत को भूल गया, जो परमात्मा रूपी कूटस्थ तोते ने उसे दिया था। जिससे वह परमात्मा को देख नहीं पाता। गुरु मंत्र ही वह संकेत शब्द है जिससे परमात्मा रूपी तोते के दर्शन संभव हैं। जीवात्मा ने कबूल किया है कि प्रभु मैं वह संकेत भूल गया जो तुमने दिया था।

-किरीट भाई

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