Home अमृत कलश सुवर्ण न्याय ही सच्चा

सुवर्ण न्याय ही सच्चा

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दुनिया मैं बहुत से झगड़े करार के अर्थ के कारण उत्पन्न होते हैंऋ इकरारनामा कितनी ही स्पष्ट भाषा में क्यों न हो, तो भी भाषाशास्त्री राई का पर्वत कर देंगे। इसमें सभ्य-असभ्य का भेद नहीं रहता। स्वार्थ सब को अंधा बना देता है। राजा से लेकर रंक तक सभी लोग करारों के खुद को अच्छे लगने वाले अर्थ करके दुनिया को, खुद को और भगवान को धोखा देते हैं। इस प्रकार पक्षकार लोग जिस शब्द अथवा वाक्य का अपने अनुकूल पढऩे वाला अर्थ करते हैं, न्याय शास्त्र में उसे द्विअर्थी मध्यम पद कहा गया है। सुवर्ण अन्याय तो यह है कि विपक्ष ने हमारी बात का जो अर्थ माना हो, वही सच आ जाए। हमारे मन में जो हो, वह खोटा अथवा अधूरा है। और ऐसा ही दूसरा सुवर्ण न्याय यह है कि जहां दो अर्थ हो सकते हैं वहां दुर्बल पक्ष जो अर्थ करें उसे सच माना जाना चाहिए। सुवर्ण मार्गों का त्याग होने से ही अक्सर झगड़े होते हैं और अधर्म चलता है। और इस अन्याय की जड़ असत्य है जिसे सत्य के ही मार्ग पर जाना है। जिसे सुवर्ण मार्ग सहज भाव से मिल जाता है उसे शास्त्र नहीं खोजने पड़ते। मेरी ‘मां’ ने मांस शब्द का जो वर्तमान अर्थ और जिसे मैं उस समय समझा, वही मेरे लिए सच्चा था। वह अर्थ नहीं जिसे मैं अपने अधिक अनुभव से तथा अपनी विद्वता के मद में सीखा समझा था।
-महात्मा गांधी

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