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राष्ट्रवादी होना

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राष्ट्रवादी हुए बिना कोई अंतरराष्ट्रीयतावादी नहीं हो सकता। अंतर्राष्ट्रीयतावाद तभी संभव है जब राष्ट्रवाद सिद्ध हो चुके यानी जब विभिन्न देशों के निवासी अपना संघठन कर लें और हिल-मिलकर एकतापूर्वक काम करने की सामर्थ्य प्राप्त कर लें। राष्ट्रवाद में कोई बुराई नहीं है, बुराई तो उस संकुचितता, स्वार्थ वृत्ति और बहिष्कार वृत्ति में है जो मौजूदा राष्ट्रों के मानस में जहर की तरह मिली हुई है।

हर एक राष्ट्र दूसरे की हानि करके अपना लाभ करना चाहता है और उसके नाश पर अपना निर्माण करना चाहता है। भारतीय राष्ट्रवाद ने नया रास्ता लिया है। वह अपना संघठन या अपने लिए आत्म प्रकाशन का पूरा अवकाश, विशाल मानव जाति के लाभ के लिए, उसकी सेवा के लिए ही चाहता है।

-महात्मा गांधी

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