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मन की गति

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मन इतना बलवान् तथा दुराग्रही है कि कभी-कभी यह बुद्धि का उल्लंघन कर देता है, यद्यपि उसे बुद्धि के अधीन माना जाता है। इस व्यवहार-जगत् में जहाँ मनुष्य को अनेक विरोधी तत्त््वों से संघर्ष करना होता है उसके लिए मन को वश में कर पाना अत्यन्त कठिन हो जाता है। कृत्रिम रूप में मनुष्य अपने मित्र तथा शत्रु दोनों के प्रति मानसिक संतुलन स्थापित कर सकता है, किन्तु अंतिम रूप में कोई भी संसारी पुरुष ऐसा नहीं कर पाता, क्योंकि ऐसा कर पाना वेगवान वायु को वश में करने से भी कठिन है।

वैदिक साहित्य (कठोपनिषद् 1.3.3-4) में कहा गया है—आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरं रथमेव च बुद्धिं तु सारथिं विद्धि मन: प्रग्रहमेव च। इन्द्रियाणि हयानाहुर्विषयांस्तेषु गोचरान्न आत्मेन्द्रियमनोयुक्तं भोक्तेत्याहुर्मनीषिण:॥ ”प्रत्येक व्यक्ति इस भौतिक शरीर रूपी रथ पर आरूढ़ है और बुद्धि इसका सारथी है। मन लगाम है तथा इंद्रियाँ घोड़े हैं। इस प्रकार मन तथा इंद्रियों की संगति से यह आत्मा सुख या दु:ख का भोक्ता है।

ऐसा बड़े बड़े चिन्तकों का कहना है। यद्यपि बुद्धि को मन का नियन्त्रण करना चाहिए, किन्तु मन इतना प्रबल तथा हठी है कि इसे अपनी बुद्धि से भी जीत पाना कठिन हो जाता है जिस प्रकार कि अच्छी से अच्छी दवा द्वारा कभी-कभी रोग वश में नहीं हो पाता। ऐसे प्रबल मन को योगाभ्यास द्वारा वश में किया जा सकता है, किन्तु ऐसा अभ्यास कर पाना अर्जुन जैसे संसारी व्यक्ति के लिए कभी भी व्यावहारिक नहीं होता। तो फिर आधुनिक मनुष्य के सम्बन्ध में क्या कहा जाय ? यहाँ पर प्रयुक्त उपमा अत्यन्त उपयुक्त है—झंझावात को रोक पाना कठिन होता है और उच्छृंखल मन को रोक पाना तो और भी कठिन है।
-भगवद्गीता

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