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मानवता की सेवा

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मानवता की सेवा करना श्रेष्ठता है और किसी को नुकसान पहुंचाना पाप है। असंख्य पुस्तकों में दिखाए जाने वाले ज्ञान को इस आधी पंक्ति में सारयुक्त कहा जा सकता है। वस्तुत: दूसरों की परवाह करना इसी भावना की हमें आवश्यकता है। जब मैं बड़े शहरों में जाता हूं तो पाता हूं कि लोग परवाह करना छोड़ चुके हैं। वह अपने आसपास के लोगों की जरूरतों के प्रति असंवेदनशील व तटस्थ हो चुके हैं। उनके आसपास व्याप्त कष्ट और दु:ख के प्रति उनका दृष्टिकोण इन शब्दों में परिभाषित किया जा सकता है- इससे हमें कोई सरोकार नहीं है।

निश्चित ही इससे हमें सरोकार है। मानवता से हमारा सरोकार है। वेद हमें ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अद्भुत अवधारणा देते हैं। मानवता एक परिवार है और मानवता के इस परिवार में हर आदमी मेरा भाई है, हर औरत मेरी बहन है। उनके लिए मैं जो कर सकता हूं, वह करना मेरा कर्तव्य है। मैं प्राय: लोगों से कहता हूं कि प्रेम का उल्टा घृणा नहीं ह। प्रेम का उल्टा भावहीनता या जड़ता है।

अपने आसपास के लोगों के प्रति तटस्थता?। हम सभी सहायता करने और साझा करने की भावना के साथ जन्में हैं। लेकिन कहीं न कहीं जैसे जैसे हम बड़े होते हैं, इस महत्वपूर्ण जन्म भावना को त्याग देते हैं। -साधु वासवानी

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