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आत्मसाक्षात्कार

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आत्मसाक्षात्कार अर्थात् यथार्थ बोध जीवन का परम पुरुषार्थ है। विवेक-वैराग्य के अभाव के कारण अंत:करण में अंकुरित अज्ञानजन्य विकृतियों से मुक्त अध्यात्म-सम्पन्न मनुष्य ही लोकोपयोगी सिद्ध होते हैं।अत: आत्म प्रकाश द्वारा स्वयं में स्थित अनन्त को उजागर करना हमारी प्राथमिकता बने ! आत्म-साक्षात्कार करना ही मनुष्य जीवन का एकमात्र उद्देश्य है। जन्मदिवस से भी हजारों गुना ज्यादा महत्त्वपूर्ण होता है – ‘आत्मा-साक्षात्कार दिवस’ । आत्म-साक्षात्कार क्या है? ‘अपरोक्ष आनन्द की अनुभूति है।

‘आत्म-साक्षात्कार’ जो सभी के हृदयों को सत्ता, स्फूर्ति और चेतना देता है, सब तपों और यज्ञों के फल का दाता है, ईश्वरों का भी ईश्वर है उस आत्म-परमात्म देव के साथ एकाकार होने की अनुभूति का नाम है – आत्म-साक्षात्कार। यह शुद्ध आनन्द व शुद्ध ज्ञान की अनुभूति है। इस अनुभूति के होने के बाद अनुभूति करने वाला नही बचता, अर्थात् उसमें कर्तृत्व-भोक्तृत्व भाव नही रहता, वह स्वयं प्रकट ब्रह्मरूप हो जाता है। जैसे लोहे की पुतली का पारस से स्पर्श हुआ तो वह लोहे की पुतली नही रही सोने की हो गयी, ऐसे ही आपकी मति जब परब्रह्म परमात्मा में गोता मरती है तो ऋतंभरा प्रज्ञा हो जाती है। ऋतंभरा प्रज्ञा यानी सत्य में टिकी हुई बुद्धि। ऐसा प्रज्ञावान पुरुष के श्रीमुख से जो भी निकलेगा वह जो बोलेगा सत्संग हो जायेगा।

राजा परीक्षित ने सात दिनों में साक्षात्कार करके दिखा दिया, किसी ने चालीस दिन में करके दिखा दिया। महापुरुषों ने यहाँ तक कहा कि चालीस साल में भी परमात्मा का साक्षात्कार हो जाये तो सौदा सस्ता है। वैसे भी करोड़ों जन्म ऐसे ही बीत गये साक्षात्कार के बिना। कोई कितना भी प्रतिष्ठित क्यों ना बन जाये, प्रधानमंत्री बन जाओगे तो भी कुर्सी से एक दिन हटना पड़ेगा। एक बार साक्षात्कार हो जाये तो मृत्यु के समय भी आपको यह नही लगेगा कि ‘मैं मर रहा हूँ’। बीमारी के समय भी नही लगेगा कि ‘मैं बीमार हूँ’।

आत्म-साक्षात्कार का साधन-जप। जप में पवित्रता-शुद्धता व निरंतरता हो तो शीघ्र ही आत्मतत्व की अनुभूति होने लगती है। यदि उत्तम साधक है तो उसे शीघ्र आत्म-साक्षात्कार, परमात्म तत्त्व की अनुभूति हो सकती है। ठाकुर रामकृष्ण परमहँस जी कहा करते थे कि जिसमें पृथ्वी जैसी सहनशक्ति और सुमन जैसा सौरभ, सूर्य जैसा प्रकाश और सिंह जैसी निर्भीकता, गुरूओं जैसी उदारता और आकाश जैसी व्यापकता होती है। जैसे पानी में किसी को देर तक दबाये रखें और उसे बाहर आने की जैसी तड़प होती है, ठीक ऐसे ही जिसकी संसार से बाहर निकलने की तीव्र तड़प हो, उसको जब सदगुरू मिल जाये तो तीन दिन में काम बन जाये। और, ऐसी तैयारी न हो तो फिर उपासना, साधना करते-करते शुद्ध अन्त:करण का निर्माण करना होगा। -स्वामी अवधेशानंद गिरि

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