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कुम्हार के हाथ

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तुमने कभी कुम्हार को घड़ा बनाते देखा है? क्या करता कुम्हार? भीतर से तो सम्हालता है घड़े को, चाक पर रखता है, मिट्टी कोभीतर से सम्हालता है और बाहर से चोट करता है। एक हाथ से चोट मारता है, एक हाथ से सम्हालता है। इसी से घड़े की दीवाल उठनी शुरू होती है, घड़ा बनना शुरू होता है। भीतर से सम्हालता जाता है, बाहर से चोट करता जाता है। कबीर ने कहा कि यही गुरु का काम है। एक हाथ से चोट करता एक हाथ से संभालता है।

अगर तुमने चोट ही देखी तो तुमने आधा देखा? अगर तुमने सम्हालना ही देखा तो भी तुमने आधा देखा। तो तुम गुरु की पूरी कीमिया से परिचित न हो सके। फिर पूरा रसायन तुम्हें समझ में नहीं आएगा। इधर चोट मारता, इधर समझा लेता। इतनी भी चोट नहीं मारता कि तुम भाग ही खड़े हो जाओ। इतना भी नहीं समझा लेता कि तुम वहीं के वहीं रह जाओ जैसे आए थे। चोट भी किए चला जाता है ताकि तुम बदलो भी लेकिन चोट भी इतनी मात्रा से करता है होम्योपैथी के डोज देता है धीरे-धीरे।

एकदम एलोपैथी का डोज नहीं दे देता कि तुम या तो भाग ही खड़े हो या खत्म हो जाओ। बहुत छोटी मात्रा में चोट करता है। देखता है कितनी दूर तक जा सकोगे। फिर रुकता है, देखता है कि ज्यादा हो गई, तिलमिला गए, भागे जा रहे हो तो फिर थोड़ा समझा लेता है। एक हाथ से सम्हालो, एक हाथ से चोट करते जाओ।

-ओशो

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