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सुख-दुख का सदुपयोग

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सुख दुख का सदुपयोग करना ही अमरत्व प्राप्ति का साधन है। सुखदायी-दुखदायी परिस्थिति से सुखी-दुखी होना ही व्यथित होना है। सुखी-दुखी होना सुख-दुख का भोग है। भोगी व्यक्ति कभी सुखी नहीं रह सकता। साधक को सुख दुख का भोग नहीं करना चाहिए, प्रत्युत सुख दुख का सदुपयोग करना चाहिए । सुखदायी-दुखदायी परिस्थिति का प्राप्त होना प्रारब्ध है और उस परिस्थिति की साधन सामग्री मानकर उसका सदुपयोग करना वास्तविक पुरुषार्थ है । इस पुरुषार्थ से अमरता की प्राप्ति हो जाती है। सुख का सदुपयोग है- दूसरों को सुख पहुंचाना, उनकी सेवा करना और दुख का सदुपयोग है- सुख की इच्छा का त्याग करना। दुख का सदुपयोग करने पर साधक दुख के कारण की खोज करता है । दुख का कारण हैज्सुख की इच्छा- ये हि संस्पर्शजा भोगा दु:खयोनय एव ते। आद्यन्तवन्त: कौन्तेय न तेषु रमते बुध:॥

(गीता 5 । 22) । हे कुन्तीनन्दन ! जो इन्द्रियों और विषयों के संयोग से पैदा होने वाले भोग (सुख) हैं वे आदि अन्त वाले और दु:ख के ही कारण हैं। अत: विवेकशील मनुष्य उनमें रमण नहीं करता। जो सुख दुखका भोग करता है, उस भोगी का पतन हो जाता है और जो सुख दुख का सदुपयोग करता हे, वह योगी सुख दुख दोनों से ऊंचे उठकर अमरता का अनुभव कर लेता है ।

-एसएन मिश्रा

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