Home अमृत कलश जिसने आत्मा खो दी

जिसने आत्मा खो दी

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एक जर्मन कथा के अनुसार एक मनुष्य ने अपनी प्रतिछाया खो दी। यह बड़ी ही विचित्र बात है। एक मनुष्य ने अपनी छाया खो दी और उसके लिए उसे हानि उठानी पड़ी। उसके सब मित्रों ने उसे तज दिया। संपूर्ण संपत्ति ने उसे छोड़ दिया। छाया खोने के बदले जिस मनुष्य ने अपना सारांश खो दिया हो, उसके लिए आप क्या विचार करेंगे।

जो मनुष्य केवल अपनी छाया खो बैठा है, उसके उद्धार की आशा हो सकती है किंतु जो अपना वास्तविक सारांश शरीर खो चुका है, उसके लिए कौन सी आशा हो सकती है। संसार में अधिकतर मनुष्यों की यही गति है। वे अपनी छाया ही नहीं, अपना मुख्यांश, अपनी वास्तविकता खो चुके हैं। अचंभो का अचंभा ! शरीर छाया मात्र है, वास्तविकता है।

वास्तविक स्वयं, वास्तविक आत्मा, हर एक मनुष्य हम से अपनी छाया की चर्चा करेगा। हर एक पुरुष अपने शरीर के संबंध की प्रत्येक और तुच्छ से तुच्छ बात बताएगा किंतु अपने वास्तविक स्वयं, वास्तविक ईश्वर अंश, वास्तविक आत्मा संबंधी हर एक बात बताने वाले कितने थोड़े आदमी हैं। तुम कौन हो? यदि तुमने अपनी आत्मा ही खो दी तो सारे संसार की प्राप्ति से भी क्या लाभ? लोग संपूर्ण संसार के पाने की चेष्टा कर रहे हैं परंतु वे जीव आत्मा से रहित हो रहे हैं। खो गया, खो गया, खो गया। क्या खो गया? घोड़ा या घुड़सवार? घुड़सवार खो गया है। शरीर घोड़े के सदृश्य है। औरआत्मा, सच्चा स्वयं, जीवात्मा घुड़सवार के तुल्य। घोड़ा तो है घुड़सवार खो गया है।

– स्वामी रामतीर्थ

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