Home अमृत कलश कुल नही, कर्म

कुल नही, कर्म

18
0

इतिहास पुराणों में कुल पर कर्म को प्रधानता देने वाले कितने ही किस्से भरे पड़े हैं। फिर भगवान गौतम बुद्ध ने तो आजीवन अपने उपदेशों और व्यवहारों में यही सिद्ध किया था। बौद्ध धर्म की बुनियाद ही कर्म है, कुल नहीं। गौतम के लिए महाराज बिंबिसार और आम्रपाली के आमंत्रण में कोई अंतर नहीं था। जातिभेद और ऊंच-नीच का विचार रखने वाला धर्म उन्हें मान्य नहीं था। उनकी दृष्टि में धार्मिक और पवित्र जीवन व्यतीत करने से ब्राह्मण हो या शूद्र, वह समान सम्मान का ही अधिकारी था।

धम्मपद में सुस्पष्ट घोषणा है-मनुष्य अपने कुल या जन्म से ब्राह्मण नहीं होता, प्रत्युत जहां सच्चाई और पवित्रता है, वही ब्राह्मणत्व है। वासेत्त सुत्त में लिखा है- मैं किसी को उसके जन्म से अथवा उसके किसी विशेष माता-पिता से उत्पन्न होने के कारण ब्राह्मण नहीं मानता। ब्राह्मण तो वह है जिसके पास कुछ न हो और फिर भी वह किसी वस्तु की लालसा नहीं रखता। जो कामना से रहित है और जिसने इंद्रियों का दमन किया है।

  • आचार्य जानकी वल्लभ शास्त्री (मेरा रास्ता आसान नहीं)

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here