Home अमृत कलश धर्म की ग्लानि का अर्थ

धर्म की ग्लानि का अर्थ

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‘श्रीमद्भागवत गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाते हुए अवतार ग्रहण करने की व्याख्या प्रस्तुत की है। इसमें कहा गया है कि जब-जब पृथ्वी पर धर्म की ग्लानि होती है तब तब मैं धर्म के उत्थान के लिए, साधु जनों की रक्षा के लिए, पाप करने वाले दुष्ट जनों का विनाश करने के लिए और धर्म की अच्छी प्रकार से स्थापना करने के लिए प्रत्येक युग में अवतार ग्रहण करता हूं अर्थात प्रकट हुआ करता हूं। गीता के उपर्युक्त निर्वचन को अवतारवाद का प्रमुख आधार माना जा सकता है।

विचारणीय है कि श्रीमद्भागवत ‘ग्लानि से क्या तात्पर्य मानती है? धर्म व्यापक शब्द है। शंकराचार्यजी ने धर्म की व्याख्या करते हुए कहा है कि वर्णाश्रम आदि जिसके लक्षण है और प्राणियों की उन्नति और परम कल्याण का जो साधन है, उसे ही धर्म समझना चाहिए। वस्तुत: धर्म से तात्पर्य यहां प्रकृति नियमों के स्वस्थ संचालन से लिया जा सकता है जिसके अंतर्गत नदियों का जल पूरित रहना, वनों और वन औषधियों से पृथ्वी तल का हरा-भरा और ऑक्सीजन से पूरित रहना, वर्णाश्रम धर्म के अनुरूप मानव जीवन का नियमन होना आदि माना जा सकता है।

जब प्रकृति अथवा सहज युक्तियों में विक्षोभ होता है अथवा प्रकृति पर कोई आघात किया जाता है तब पर्यावरण का असंतुलन शुरू होता है। सामाजिक एवं आचरणगत नियमों का सम्यक अनुपालन नहीं हो पाता है, एक अव्यवस्था की स्थिति उत्पन्न होने लगती है। तब परमेश्वर प्रकृति नियमों को संतुलित करने के लिए अर्थात धर्म के क्षेत्र में उत्पन्न ग्लानि के निवारण हेतु कोई न कोई अवतार रूप ग्रहण कर लेते हैं।

वह पालनकर्ता विष्णु रूप परमेश्वर अपने सुकृतों एवं आचरण से धर्म की पुन: प्रतिष्ठा करता है और युगीन व्यवस्था के लिए एक जीवन मूल्य का उदाहरण प्रस्तुत करता है। ताकि लोग उसी के अनुरूप चलकर अपने जीवन को स्वस्थ और कल्याणकारी बना सकें। हिंदू अध्यात्मवाद में विष्णु के अवतार ग्रहण करने का यही लक्ष्य परिकल्पित किया गया है।

-सत्येंद्र सिंह (‘साहित्य एवं कला में दशावतार)

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