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गुरु का प्रकाश

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शिष्य यदि अंधकार है तो गुरु प्रकाशित प्रकाश है। क्योंकि गुरु प्रकाशित हुआ है, वह प्रकाश में है इसलिए वह समझ सकता है कि अंधकार क्या है, कैसा है कहां है और क्यों है। पर प्रकाश पर काम करने से कुछ नहीं होगा। माना प्रकाश के करते ही अंधकार तिरोहित हो जाता है पर मन का अंधकार अलग है। यह किसी बाहर के प्रकाश से दूर नहीं किया जा सकता क्योंकि मन का प्रकाश मन के अंदर ही है। हैरानी की बात तो यह है कि अंधकार और प्रकाश दोनों की यहां एक ही जगह है।

जहां अंधकार है वहीं प्रकाश का स्रोत भी छिपा है। जैसे-जैसे अंधकार मिटता चला जाता है, वैसे-वैसे प्रकाश प्रकट होने लगता है। जैसे बीज के अंदर वृक्ष है और पत्थर के भीतर मूर्ति है वैसे ही अंधकार के अंदर प्रकाश है। बीज मिटता है तो छिपा वृक्ष प्रकट होता है। वह वृक्ष कहीं बाहर से नहीं आता, उसी बीच में सुप्त अवस्था में होता है।

जैसे कोई शिल्पकार किसी पत्थर को काटता-छांटता है और अंदर छिपी प्रतिमा उभरने लगती है, उसी तरह गुरु जैसे-जैसे शिष्य के अज्ञानता रूपी अंधकार पर कार्य करता है, वैसे वैसे वही से प्रकाश की पौ फटने लगती है। इसके बाद एक दिन ऐसा आता है जब शिष्य गुरु के प्रयास से इसी अंधकार से प्रकाश को उपलब्ध हो जाता है। शिष्य यात्रा अंधकार की करता है परंतु मंजिल प्रकाश की प्राप्त होती है। कीचड़ के आधार पर कमल खिलता है। कोयले के गर्भ में हीरा पनपता है, उसी तरह अंधेरे के आधार पर प्रकाश उपलब्ध होता है और असली गुरु आधार पर ही कार्य करता है। गुरु शिष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है।

  • शशिकांत सदैव
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