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संसार की माया

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संसार की रचना दैवीय ऊर्जा यानी शक्ति से हुई है। यह सारी सृष्टि दैवीय ऊर्जा के कारण है। परंतु इस ऊर्जा की प्रकृति क्या है? इसे अपनी सृष्टि की प्रकृति के अनुसार होना चाहिए। माया तो स्वयं भ्रामक है। इस किसी के द्वारा इसके बाहर से देखा जाना चाहिए परंतु कोई दृष्टा इसे कैसे देख सकता है, इसकी अवस्था के बारे में कैसे बता सकता है? आप सिनेमा के पर्दे पर बहुत से दृश्यों को चलते हुए देखते हैं।

आग से इमारतें नष्ट हो जाती हैं, पानी के वेग से जहाज टूट जाते है परंतु जिस पर्दे पर यह सब दिखाया जा रहा है, उस पर आग या पानी का कोई असर नहीं होता। क्यों? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि वह पर्दा असली है और उस पर जो दिखाया जा रहा है वह नकली है। ठीक उसी तरह दर्पण से कितने प्रतिबिंब गुजरते हैं परंतु इस पर उनकी संख्या या गुणवत्ता का कोई असर नहीं होता।

ठीक उसी तरह संसार एक अद्भुत घटना है जो वास्तविकता की बुनियाद पर टिका है, जो कि किसी तरह से प्रभावित औनहीं होता। सत्य केवल एक है। केवल दृष्टिकोण में अंतर के कारण ही माया की बात होती है। अपने दृष्टिकोण को उस ज्ञान के अनुसार बदल दो। तब तुम इस ब्रह्मांड को ब्रह्म के समान जानोगे। अभी संसार में मग्न होने के कारण तुम इसे यथार्थ जगत मानते हो इससे परे हो जाओ और यह ओझल हो जाएगा और केवल सत्य शेष रहेगा।

जब आत्मा का बोध मिलता है तो संसार का वस्तुनिष्ठ रूप दिखाई देना बंद हो जाता है। यह माया है जिसके वश में आकर हम सदा नित्य और शाश्वत, स्वप्रकाशित और अपने अस्तित्व का मर्म, आत्मा को अस्तित्वविहीन और असत्य मानते हैं। इसके विपरीत माया ही हमें संसार, अहं, ईश्वर को सत्य और अस्तित्व में बने रहने वाले मानने पर विवश करती है।
-महर्षि रमण

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