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जीवन का आधार

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तुम्हारा जीवन तुम्हारा है। समय के अनंत प्रवाह में मात्र एक घटना है। समय और स्थान की विराटता में जीवन की तुच्छता का भान होते ही समर्पण घट जाता है। जरा खगोल शास्त्र देखो तो जानो, लाखों तारे अति विशाल सौर्य मंडल, उसमें पृथ्वी का क्या स्थान है? फिर उस पृथ्वी पर एक मानव के जीवन की क्या गिनती? इस अनंतता का विचार आते ही समर्पण हो जाता है।

समष्टि से संबंध बनाओ तो भी समर्पण घट जाएगा। अपने को एक आत्मा एक अलग इकाई मत समझो। जब एक पानी का प्याला समझे ‘मैं तो सागर में हूं’ तो बड़ा बल मिलता है। अपनेपन का बोध होता है। अंधकार के गर्भ से ही प्रकाश का जन्म होता है।

आंख के भीतर काले दृष्टि पटल के कारण ही हम प्रकाश देख सकते हैं। अंधकार के बिना प्रकाश नहीं देख सकते। जिस प्रकार प्रत्येक नदी किसी बड़ी झील में अथवा सागर में विलीन हो जाती है, ऐसे ही जीवन में अनंत अस्तित्व में, ब्रह्म में, बृहत चेतना में समा जाता है। वही जीवन का आधार है। वही उसका उत्कर्ष है।
-श्री श्री रविशंकर

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