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पराजय से सीख

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पराजय के क्षणों ने ही संसार में बड़े-बड़े विजेता और महान पुरुष बनाए हैं। पराजय के प्रत्येक जीवन में आते हैं। असफलता से प्रत्येक मनुष्य की भेंट होती है और असफलता को प्रत्येक मनुष्य अपनी दृष्टि से देखता है। कुछ लोग पहली हार से ही निढाल होकर सदा के लिए बैठ जाते हैं। असफलता की पहली झपट में ही वे निश्चेष्टता के शिकार हो जाते हैं। देव ही विपरीत है, सारा जमाना दुश्मन है, हम कमजोर हैं, क्या करें आदि बहाने उन्हें मनुष्य के लिए नपुंसक बना देते हैं। दूसरे कुछ लोग ऐसे हैं जो पहली हार से सबक सीख कर दूसरे अभियान की तैयारी शुरू कर देते हैं। दूसरी हार भी उन्हें नया सबक देती है। हर हार के बाद उसका मन नए अनुभव पाने की खुशी में नाच उठता है। प्रत्येक पराजय उन्हें उनकी कठिनाइयों का ज्ञान देती है और कठिनाइयों को हल करने की नई सूझ आती है। हार कर जब वे फिर उठते हैं तो उन्हें यह संतोष होता है कि चलो एक पड़ाव और तय हो गया। अब मंजिल साफ नजर आने लगी है। असफलता को जीवन की एक साधारण सी घटना ही समझना चाहिए। ठोकर खाकर मनुष्य को यह देखना चाहिए कि ठोकर उसने क्यों खाई। वह सही रास्ते पर ही जा रहा था या रास्ता भूल कर किसी और दिशा में चल पड़ा था। ऐसी अवस्था में वह ठोकर उसे सावधान करने के लिए आती है। वह उसे कहती है-अभी बहुत दूर नहीं आए हो,यह रास्ता तुम्हारा रास्ता नहीं है। अब भी लौट जाओ। अनमने भाव से चलने वाला राही ही ठोकर खाता है। अव्यवस्थित चित्त से चलता हुआ पथिक ही पराजय पाता है। ठोकर खाने के बाद उसे तन्मय होकर फिर से निशाना साधने की तैयारी करनी चाहिए। पराजय व असफलता की घडिय़ों में हम प्रेरणा व उत्साह ग्रहण करना सीखें तो सफलता हमारी सहचरी बन जाएगी ।
-सत्यकाम विद्यालंकार

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