Home अमृत कलश कहत कबीर

कहत कबीर

27
0


कबीर कहते हैं-‘जम ते उलट भए हैं राम, दु:ख बिनसे सुख कियो विसराम।’ और दु:ख विनष्ट हो गए हैं और सुख में विश्राम आ गया है। दु:ख एक दौर है और सुख एक विश्राम है। और तुम दौड़ते हो सुख पाने को। तुमने गणित ही गलत पकड़ रखा है। तुम सोचते हो दौड़-दौड़ के सुख पा लोगे। दौड़-दौड़ के आदमी दु:ख पाता है। दौड़ का अंतिम नतीजा दु:ख है।

सुख तो एक विश्राम की घड़ी है जब दौड़ बंद हो जाती है, तुम ठहर जाते हो; जब तुम जहां हो, वही होते हो; जब तुम इंच भर भी चलते नहीं। इस विश्राम की घड़ी में सुख ही सुख है। ऐसा समझो कि सुख तुम दौड़ के खोते हो, दु:ख दौड़ कर कमाते हो। ‘दु:ख बिनसे सुख कियो विसराम।’ हमारे सारे बुद्ध पुरुषों ने कहा है वासना, कामना दु:ख का मूल है और संतोष सुख का। संतोष का अर्थ है विश्राम। संतोष का अर्थ है जो है वह काफी है, काफी से ज्यादा है। जो है उसे भी भोग लूं, इसकी क्षमता कहां? तुम थोड़ा सोचो, जो है उसे भोगने की क्षमता है तुम्हारी?

तुम तो और पाने को भाग रहे हो। दुनिया में दो तरह के लोग हैं। एक जो अपने पात्र को बड़ा करते हैं क्योंकि जो मिला है वह इतना ज्यादा है कि इस पात्र में संभाले नहीं संभलता। यही लोग साधक हैं जो पात्र को बड़ा करते हैं, जो स्वयं को फैलाते हैं। और दूसरे हैं जिन्हें इसकी फिक्र ही नहीं है कि पात्र हमारे पास है भी या नहीं। जो भागे जा रहे हैं, जो सुख की तलाश कर रहे हैं। वे किसी दिन अगर तलाश भी कर ले तो क्या करेंगे? वे पाएंगे कि पात्र तो उनके पास है ही नहीं।

कबीर तो इससे उलट कहते हैं-‘दुई हाथ उलीचिए।’ दोनों हाथों से उलीचो। तुम, हजार हाथ भी हों और उलीचो तो कम होगा, क्योंकि तुम सीमित नहीं, असीम हो। तुम वह नहीं हो जो दिखाई पड़ते हो। कुआं दिखाई तो छोटा पड़ता है ऊपर से। नीचे तो सागर से जुड़ा है। और ध्यान रखना जो नहीं देगा वह छीनेगा। छीनना ही पाप है। देना पुण्य है, बांटना पुण्य है, लूटना पाप है

Previous articleसरकार की बात
Next articleपागल कौन

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here