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ईष्र्या और द्वेष

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किसी को देखकर नहीं अपितु किसी के लिये जलो। किसी को देखकर जलना तो मनुष्य जीवन का पतन है वहीं किसी के लिये जलना मनुष्य जीवन की उपलब्धि। दीपक का जीवन इसलिए वन्दनीय नहीं हैं कि वह जलता है अपितु इसलिए वन्दनीय है कि वह दूसरों के लिये जलता है। वह स्वयं वेदना सहता है और दूसरों को प्रकाश ही बाँटता है। जीवन वही सार्थक है जो मिट्टी बनने से पहले दूसरों के लिये मिट जाये, नियति तो मिट्टी बनना ही है। ईष्र्या और द्वेष में जलना बड़ी नासमझी है।

ईष्र्या और द्वेष वो आग है जिसे पानी से बुझाना सम्भव नहीं। यह आग तब तक शांत नहीं होती जब तक स्वयं उस ईष्र्यालु मनुष्य को पूर्ण जलाकर भस्म न कर दे। इसलिए अगर हिम्मत हो तो अवश्य जलो मगर दीपक की तरह। द्वेष्यो न साधुर्भवति मेधावी न पंडित: । प्रिये शुभानि कार्याणि द्वेष्ये पापानि चैव हि॥ जिस व्यक्ति से द्वेष हो जाता है वह न साधु जान पड़ता है, न विद्वान और न बुद्धिमान। जिससे प्रेम होता है उसके सभी कार्य शुभ और शत्रु के सभी कार्य अशुभ प्रतीत होते हैं।

महाभारत कहती है -य ईर्षु: परवित्तेषु रुपे वीर्ये कुलान्वये। सुखसौभाग्यसत्कारे तस्य व्याधिरनन्तक:॥ विदुर नीति के अनुसार जो व्यक्ति दूसरों की धन -सम्पति , सौंदर्य, पराक्रम, उच्च कुल, सुख, सौभाग्य और सम्मान से ईष्र्या व द्वेष करता है वह असाध्य रोगी है। उसका यह रोग कभी ठीक नहीं होता। मूर्खाणां पण्डित: द्वेष्या: अधनानां महाधना:। वाराङ्गना: कुलस्त्रीणां सुभगानां दुर्भगा:॥

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