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यह धर्म नहीं

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प्रत्येक व्यक्ति मंदिर जाता है और स्वयं के लिए प्रार्थना करता है- टहे भगवान! मेरी रक्षा कीजिए।’ एक बार भी हम लोगों ने किसी और पर कृपा करने की प्रार्थना नहीं की। यह कैसा धर्म है? यह कैसी आध्यात्मिकता है? यह प्रश्न वर्तमान समय में पहले श्री रामकृष्ण (परमहंस) द्वारा और फिर स्वामी विवेकानंद द्वारा उठाया गया। श्री रामकृष्ण ने कहा था, धर्म खाली पेट के लिए नहीं है और स्वामीजी ने कहा मैं उस भगवान या धर्म पर विश्वास नहीं करता, जो न विधवाओं के आंसू पोंछ सकता है और न अनाथों के मुंह में रोटी का एक टुकड़ा ही पहुंचा जा सकता है। यह आर्त्तनाद हमारे चारों ओर है। क्या मैं लोगों की देखभाल नहीं कर सकता? क्या मैं उन लोगों की आंखों में आंसू नहीं पोंछ सकता? क्या यह धर्म नहीं है? अपने से यह प्रश्न कीजिए। गीता आपको बताएगी कि यह सच्चा धर्म है। उपनिषदों पर आधारित गीता आपको कर्म करने के लिए कहती है क्योंकि जिस प्रकार प्रार्थना धर्म का अंग है, वैसे ही कर्म भी धर्म का अंग है। लेकिन हमने उपनिषदों की यह शिक्षा कभी नहीं समझी। स्वामी विवेकानंद ने कहा था अपने में स्थित ईश्वर पर आंखें मूंदकर ध्यान करो और जब तुम आंखें खोलो तब वही ईश्वर इन रूपों में हमारे समक्ष विद्यमान है। इनकी सेवा करो। ईश्वर दो नहीं है केवल एक ही ईश्वर है जो अंदर भी है और बाहर भी। उपनिषद में श्लोक है -अंतर्बहिश्च तत सर्वं व्याप्य नारायण स्थित:।

-स्वामी रंगनाथानंद

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