Home अमृत कलश भारतवंशी हैं जापानी

भारतवंशी हैं जापानी

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स्वामी रामतीर्थ ने टोक्यो के कॉमर्स कॉलेज में महत्वपूर्ण व्याख्यान दिया, जिसका विषय था ‘सफलता का रहस्य। उसकी विचित्र आभा ने विशाल जनसमूह का ध्यान आकृष्ट कर लिया। रूसी राजदूत में जब समाचार पत्रों में उस व्याख्यान को प्रकाशित देखा तो स्वामीजी से मिलने की आकांक्षा व्यक्त की, किंतु स्वामी राम तीर्थ सेन फ्रांसिस्को रवाना हो चुके थे। टोक्यो में स्वामी रामतीर्थ ने कहा कि क्या यह आश्चर्यजनक नहीं कि भारतवर्ष से एक अभ्यागत आकर आपके समक्ष एक ऐसे विषय पर भाषण करें जिसे प्रत्यक्षत: जापान ने भारत की अपेक्षा अधिक बुद्धिमानी से ग्रहण किया है।

किसी विचार को दक्षतापूर्वक कार्यरूप में परिणित करना एक बात है और उसके आधारभूत मौलिक अर्थ को हृदयंगम करना दूसरी बात है। वर्तमान समय में चाहे कोई राष्ट्र कतिपय सिद्धांतों को कार्यांवित करता हुआ भले ही खूब फल-फूल रहा हो किंतु यदि राष्ट्रीय मस्तिष्क भली-भांति उन सिद्धांतों को समझता नहीं है, यदि उनके पीछे कोई सुनिश्चित ठोस आधार नहीं तो उस राष्ट्र के पतन की संभावना बनी रहती है। इस श्रमिक जो किसी रासायनिक क्रिया को सफलता पूर्वक करता है, वस्तुत: रसायन शास्त्र वेत्ता नहीं है।

कोयला झोंकने वाला जो सफलतापूर्वक किसी वाष्प इंजन को चला लेता है, इंजीनियर नहीं हो सकता। क्योंकि उसे केवल यांत्रिक अभ्यास हो गया है। अति किसी भी वस्तु के संपादन में यह परम आवश्यक है कि यथार्थ सिद्धांत और यथार्थ व्यवहार सदा समन्वित रहे। दूसरी बात है कि राम जापान को अपना ही देश मानता है और उसके निवासियों को अपना देशवासी। राम तर्कपूर्ण आधार से सिद्ध कर सकता है कि प्रारंभ में आपके पूर्वज भारतवर्ष से ही यहां स्थानांतरित हुए थे। आपके पूर्व पुरुष राम के पूर्व पुरुष हैं। अत: राम एक भाई के समान न कि किसी अपरिचित की भांति आप लोगों से हाथ मिलाने आया है। एक और कारण है कि जिस के बल पर राम इसी अधिकार का दावा कर सकता है। राम अपने जन्म से नहीं, अपनी प्रकृति, चाल ढाल और स्वभाव और हृदय से जापानी है।
-‘स्वामी रामतीर्थ (डॉ. लालबहादुर सिंह)

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