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विचार ही कार्य का आधार

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आजकल के समाज में एक प्रवृत्ति देखी जा रही है। वह है कार्य पर अधिक जोडर देना तथा विचार की निंदा करना। कार्य अवश्य अच्छा है पर वह भी तो विचार या चिंतन से उत्पन्न होता है।

शरीर के माध्यम से शक्ति की जो छोटी-छोटी अभिव्यक्तियां होती हैं। उन्हीं को कार्य कहते हैं। बिना विचार या चिंतन के कोई कार्य नहीं हो सकता अत: मस्तिष्क को उनके उनके विचारों उनके उनके आदर्शों से भर लो और उनको दिन-रात मन के सम्मुख रखो। ऐसा होने पर इन्हीं विचारों से बड़े-बड़े कार्य होंगे।

अपवित्रता की कोई बात मन में न लाओ। प्रत्युत मन से कहो कि मैं शुद्ध पवित्रस्वरूप हूं। हम क्षुद्र हैं। हमने जन्म लिया है, हम मरेंगे। इन्हीं विचारों से हमने अपने आप को एकदम सम्मोहित कर रखा है और इसलिए हम सर्वदा एक प्रकार के भय से कांपते हैं।

जो कुछ संस्कार और भ्रम तुम्हारे मन को ढंके हुए हैं, उन्हें भगा दो साहसी बनो सत्य को जानो और उसे जीवन में परिणत करो। चरम लक्ष्य भले ही बहुत दूर हो, पर उठो जागो, जब तक ध्येय तक ना पहुंचो, तब तक मत रुको।

-स्वामी विवेकानंद

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