Home अमृत कलश जो जागा है, वही जीता है

जो जागा है, वही जीता है

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जिंदगी को पूरी तरह सजग होकर जीना चाहिए और एक-एक स्थिति की चुनौती का सामना करना चाहिए। ठीक चरित्र के आदमी को मैं यह मान लूंगा कि वह हर एक स्थिति में सजग होकर जी रहा है। जो भी समय आए, जो भी मौका आए, वह जागा हुआ जी रहा है। जो होगा वह करेगा, न उसे करने के लिए पछतावा है पीछे। पछतावा सिर्फ सोए हुए आदमी को होता है। क्योंकि वह सोचता है कि इससे अन्यथा भी मैं कर सकता था।

जागा हुआ आदमी कहता है मैं जागा हुआ था। अन्यथा कुछ हो नहीं सकता था। जो हो सकता था वह मैंने किया क्योंकि मैं पूरा जागा था। इससे ज्यादा मैं हूं नहीं। इससे ज्यादा कोई उपाय ही नहीं है। इसलिए जागा हुआ आदमी न पीछे लौटकर देता है, न पछताता है, न दु:खी होता है। जागा हुआ आदमी जीता है और तब जीने में जो सघनता आ जाती है, क्योंकि वह न अतीत में होता है न भविष्य में होता है। वह यहीं होता है, अभी होता है। तो पूरी की पूरी जो तीव्रता चाहिए, जिंदगी की सघनता, वह उसको उपलब्ध हो जाती है।

और उस क्षण में वह जो जानता है, वह जो आप पूछते हैं कि सब सापेक्ष है ,उस क्षण में जिसे वह जानता है वह निरपेक्ष है। वह निरपेक्ष ही सारे सापेक्षों का आवर्तन जाना जाता है। एक बैलगाड़ी चल रही है। सारा चाक घूम रहा है। वह एक कील बीच में बिना घूमे हुए खड़ी है। वह भी घूम जाएगी तो चाक गिर जाएगा।

यह जो सापेक्ष का इतना बड़ा घूमता हुआ वृत्य है, जो वर्तुल है सापेक्ष का, इसके बीच में एक तत्व बिल्कुल निरपेक्ष है। वही हम हैं। उसे कोई साक्षी कहे, आत्मा कहे, ब्रह्म कहे, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। लेकिन एक तत्व जिससे आंख के सामने आती है पर्दे पर यह सारी चीजें, वह निरपेक्ष है। लेकिन इसे हम सघन क्षण में ही जान सकेंगे, साधारण अनुभव में नहीं जान सकेंगे।

-ओशो

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