Home अमृत कलश सुख भी दु:ख का साथी

सुख भी दु:ख का साथी

50
0

सुख दु:ख का ही नग्न रूप है। तुम्हारे अंदर का वही सरोवर जिसमें हास्य की हिलोर उठती रही है, प्राय: तुम्हारे ही आंसुओं से भरता रहता है। इसके अतिरिक्त और हो भी क्या सकता है?

दु:ख तुम्हारी आत्मा में जितनी गहरी रेखाएं खींचेगा, उसमें उतना ही सुख भर सकोगे। आज इस प्याले में तुमने द्राक्षा-मधु भरा है, यह वही तो है जो कल कुम्हार की भ_ी में तप चुका है और आज जो बंसी तुम्हारी व्याकुल आत्मा को लोरियां दे रही है, वह क्या वही बांस का टुकड़ा नहीं है जिसे कल बढ़ई ने पैने नश्तर से काटा था। दु:ख के क्षणों में हृदय की गहराई में झांको और देखो कि आज सुख का वही कारण है जो कल दु:ख था।

दुख के क्षणों में फिर दिल की गहराई में झांकोगे तो अनुभव करोगे कि आज तुम उसी वस्तु पर रो रहे हो जिस पर कल हंस रहे थे। कुछ लोग कहते हैं सुख दु:ख से श्रेष्ठ है। दूसरे कहते हैं नहीं, दु:ख सुख से श्रेष्ठ है। मैं कहता हूं दोनों साथी हैं। अभिन्न हैं। दोनों साथ-साथ पैदा होते हैं।

एक जब तुम्हारे पास बैठकर जागता है तो दूसरा तुम्हारी शैया पर तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा होता है। सत्य तो यह है कि सुख दु:ख के बीच तुम तराजू के पलड़ों की तरह तुले रहते हो। जब तुम रिक्त रहते हो, तभी संतुलित और संस्थित रहते हो। इसमें तभी उतार चढ़ाव आना चाहिए जब जगत का स्वामी स्वयं अपना स्वर्ण, अपनी चांदी तौलने को तुम्हें हाथ में दे। – खलील जिब्रान

Previous articleबिरसा मुंडा बलिदान दिवस: आर्य अनार्य का विमर्श
Next articleअंधेर नगरी चौपट राजा

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here