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गांधी और हिंदू दर्शन

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प्रटोरिया में वकील थे श्री बेकर। वे जितने अच्छे वकील थे उससे भी ज्यादा चुस्त ईसाई थे। ईसाई और इस्लाम के मतानुसार धर्म परिवर्तन करके नए रंगरूट भर्ती कर श्रद्धालुओं की संख्या में अभिवृद्धि करना धर्ममान्य आदर्श पुराने जमाने से चला आ रहा है। आज भी हर ईसाई और मुसलमान की यही चाहत होती है कि किसी अज्ञानी पापी काफिर को सच्चे ईश्वर का मार्ग दिखाकर उसका उद्धार करें। ऐसे धर्म परिवर्तित अनुयायी एकत्र करने से स्वर्ग में प्रतिष्ठा बढ़ती है और पुण्य जमा होता है ताकि पाप करने की सुविधा बनी रहे। साथ-साथ मोक्ष की भी व्यवस्था हो जाती है। मिस्टर बेकर के भी ऐसे ही नेक इरादे थे।

उन्होंने इस शांत और मितभाषी युवा बैरिस्टर (महात्मा गांधी को) अपने ईसाई मंडल में आग्रहपूर्वक मिलाया। रोज दोपहर को घुटने टेककर प्रार्थना में शामिल करते थे, हर रविवार को गिरजाघर का प्रवचन और बाद में धर्म चर्चा आदि। मिस्टर बेकर और उनके दो चार साथियों को विश्वास था कि एक न एक दिन वे लोग उस अज्ञानी हिंदू जवान का धर्म परिवर्तन करके उसे सही मार्ग पर ले आएंगे। उन लोगों के आग्रह पर गांधी ने बाइबिल के अतिरिक्त अनेक ईसाई ग्रंथ पढ़ लिए इतने सारे आदर्श ईसाइयों से मिलकर या धर्म ग्रंथ पढ़कर भी गांधी को उनके सिद्धांतों में अलौकिकता का आभास नहीं हुआ।

ईसाई भाइयों या धर्म गुरुओं के विचार विनिमय भी तर्कपूर्ण नहीं लगे। गांधीजी के मनो-मंथन और शंकाओं का ईसाई मित्र समाधान नहीं कर पा रहे थे। इन लोगों की तुलना में हिंदू धर्मनिष्ठ व्यक्तियों की त्याग-तपस्या कहीं ज्यादा श्रेष्ठ लगी। ऐसी स्थिति में गांधी ने निश्चय किया कि जब तक वे हिंदू धर्म के मूल तत्व को समझ नहीं लेते, तब तक धर्म परिवर्तन अनुचित होगा। अस्पृश्यता और जात-पांत की कुरीतियों से क्षुब्ध होकर हिंदू धर्म का खंडन करना गलत होगा। हिंदू धर्म को समझने के लिए उन्होंने फिर से गीता पढ़ी। गीता के अध्ययन से स्पष्ट हो गया कि हिंदू धर्म मात्र कर्मकांड नहीं है, उसका तत्व, अध्यात्म दर्शन और मीमांसा गूढ़ है।

-सुमित्रा गांधी कुलकर्णी (‘मेरे पितामह)

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